October 14, 2026
Why in news?
The Supreme Court, on 11 October 2026, directed the Centre and Delhi Police to ensure the free movement of people, subject to law and order, amid widespread restrictions and detentions involving protesters attempting to reach Jantar Mantar in Delhi. The court emphasized the normal functioning of public transport and internet services, along with strict compliance with established legal procedures for detention.
Preventive detention and prohibitory orders are instruments meant to safeguard public order, but they are not absolute tools. The constitutional imperative is to secure public safety without eroding personal liberty, due process, and the fundamental right to peaceful protest.
Why in news?: 11 अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि दिल्ली में जंतर-मंतर पहुँचने का प्रयास कर रहे प्रदर्शनकारियों पर लगी पाबंदियों और हिरासत के बीच, कानून-व्यवस्था के अधीन रहते हुए आम लोगों की आवाजाही सुनिश्चित की जाए। अदालत ने सार्वजनिक परिवहन और इंटरनेट सेवाओं के सामान्य संचालन तथा हिरासत के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के अनिवार्य पालन पर बल दिया।
परिभाषा: निवारक निरोध का अर्थ किसी व्यक्ति को बिना किसी आपराधिक मुकदमे या दोषसिद्धि के केवल इस आशंका के आधार पर हिरासत में लेना है कि वह राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के विरुद्ध कोई अपराध कर सकता है।
प्रकृति: यह दंडात्मक (Punitive) न होकर केवल निरोधात्मक या निवारक (Preventive) प्रकृति का होता है।
आधार: इसे राज्य की सुरक्षा, भारत की रक्षा, विदेशी मामलों, या सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) बनाए रखने के आधार पर लागू किया जा सकता है।
असाधारण शक्ति: इसे एक असाधारण शक्ति माना गया है, जिसका प्रयोग संवैधानिक और वैधानिक सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए।
अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
अनुच्छेद 22(1) और 22(2): सामान्य आपराधिक कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं (जैसे- गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी, कानूनी प्रतिनिधि से परामर्श का अधिकार, और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना)।
अनुच्छेद 22(3): शत्रु देश के नागरिकों और निवारक निरोध कानून के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्तियों को इन सामान्य सुरक्षा उपायों से बाहर रखता है।
अनुच्छेद 22(4): सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की पुष्टि के बिना निवारक निरोध की अवधि को सामान्यतः 3 महीने से अधिक बढ़ाने पर रोक लगाता है।
अनुच्छेद 22(5): हिरासत में लिए गए व्यक्ति को निरोध के आधार जल्द से जल्द बताने और निरोध के विरुद्ध अभ्यावेदन (Representation) देने का शीघ्र अवसर देने का प्रावधान करता है।
अनुच्छेद 22(6): लोक हित के विरुद्ध माने जाने वाले तथ्यों को उजागर न करने की छूट देता है।
अन्य संवैधानिक सुरक्षा कवच:
अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समता सुनिश्चित करता है और राज्य की मनमानी कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करता है।
अनुच्छेद 19: वाक् स्वातंत्र्य, शांतिपूर्ण सम्मेलन और संघ बनाने की स्वतंत्रता की रक्षा करता है (युक्तियुक्त निबंधनों के अधीन)।
अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है; किसी को भी केवल “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के तहत ही इससे वंचित किया जा सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980: यह अधिकारियों को राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या आवश्यक सेवाओं के रखरखाव में बाधा डालने से रोकने के लिए किसी व्यक्ति को 12 महीने तक हिरासत में रखने का अधिकार देता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163: यह दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 को प्रतिस्थापित करती है; इसके तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट उपद्रव या संभावित खतरे के आपातकालीन मामलों में निषेधाज्ञा जारी कर सकते हैं।
अन्य कानून: इसके अंतर्गत विदेशी मुद्रा संरक्षण एवं तस्करी निवारण अधिनियम (COFEPOSA), 1974 तथा गैर-कानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (UAPA), 1967 शामिल हैं।
रोलेट एक्ट (1919): औपनिवेशिक काल का कानून, जिसने बिना किसी सामान्य अदालती सुनवाई के नागरिकों को हिरासत में लेने के असाधारण अधिकार दिए।
भारत रक्षा अधिनियम (1939): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लागू की गई असाधारण शक्तियाँ।
निवारक निरोध अधिनियम (1950): स्वतंत्रता के बाद भारत का पहला निरोध कानून (जो 1969 में समाप्त हो गया)।
आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम – MISA (1971): आपातकाल के दौरान व्यापक रूप से दुरुपयोग किया गया (1978 में निरस्त)।
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम – NSA (1980): सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के आधार पर निवारक निरोध का वर्तमान वैधानिक ढाँचा।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978): यह निर्धारित किया गया कि अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली कानूनी प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और तार्किक होनी चाहिए, मनमानी नहीं।
बाबूलाल पराते बनाम महाराष्ट्र राज्य (1961): सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जारी की जाने वाली निषेधाज्ञाओं (जैसे CrPC की धारा 144) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
खुदीराम दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1975): स्पष्ट किया कि निवारक निरोध के आदेश न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन हैं, विशेषकर जब शक्ति का प्रयोग दुर्भावनापूर्ण या अप्रासंगिक आधारों पर किया गया हो।
मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018): प्रदर्शन करने के अधिकार और आम नागरिकों की आवाजाही के अधिकार के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया तथा विरोध प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध को खारिज किया।
मनमानी हिरासत का जोखिम: अस्पष्ट, असमर्थित या अप्रासंगिक आधारों पर कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग हो सकता है।
शांतिपूर्ण सम्मेलन के अधिकार पर प्रभाव: अत्यधिक निषेधाज्ञाएँ अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को सीमित करती हैं।
आनुपातिकता (Proportionality) एवं न्यायिक निगरानी: यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि लगाई गई पाबंदियाँ वास्तविक खतरे के स्तर के अनुपात में ही हों।
नागरिक सुविधाओं में बाधा: सार्वजनिक परिवहन और इंटरनेट सेवाओं पर अत्यधिक प्रतिबंध आम जनजीवन को प्रभावित करते हैं।
कानूनी अनुपालन: निवारक निरोध का प्रयोग केवल कानूनी रूप से न्यायसंगत और अत्यंत आवश्यक स्थितियों में ही किया जाए।
पारदर्शी प्रक्रिया: हिरासत के आधार तुरंत बताए जाएँ और विधिक प्रतिनिधित्व का अवसर प्रदान किया जाए।
समयबद्ध न्यायिक समीक्षा: सलाहकार बोर्ड और न्यायालयों द्वारा समयबद्ध जाँच-परख को मजबूत किया जाए।
संतुलित नियंत्रण: प्रदर्शनों और यातायात का प्रबंधन आनुपातिक और कम-से-कम प्रतिबंधात्मक उपायों द्वारा किया जाए।
निवारक निरोध और निषेधाज्ञाएँ सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के महत्वपूर्ण साधन हैं, लेकिन ये असीमित शक्तियाँ नहीं हैं। संवैधानिक उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता, उचित कानूनी प्रक्रिया और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को नुकसान पहुँचाए बिना सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखना है।
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