July 1, 2026
यह रिपोर्ट भारत की जल संकट के प्रति संवेदनशीलता और मानसून की कमी पर केंद्रित है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि कृषि और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए ‘जल बफर’ (water buffers) का निर्माण नीति निर्माताओं के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
वर्षा में कमी: जून में मानसून सामान्य से 39.8% कम रहा, जो 125 वर्षों में पांचवां सबसे सूखा जून दर्ज किया गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का अनुमान है कि इस वर्ष कुल मानसून वर्षा ‘दीर्घकालिक औसत’ (LPA) से 10% कम होगी।
जलाशयों में घटता जलस्तर: 25 जून तक, भारत के प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का 26% था, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के 36% से काफी कम है।
कृषि पर प्रभाव: मानसून की धीमी प्रगति के कारण खरीफ फसलों की बुवाई पर बुरा असर पड़ा है। 26 जून तक, खरीफ फसलों के अंतर्गत बुवाई का कुल क्षेत्रफल पिछले वर्ष की तुलना में 22.7% कम रहा, जिसमें खरीफ खाद्यान्न की बुवाई में 21.1% की गिरावट आई है।
वैश्विक अस्थिरता: रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष जैसी वैश्विक घटनाएं और जलवायु संबंधी अनिश्चितता, आर्थिक और संसाधन प्रबंधन को जटिल बना रही हैं।
राजकोषीय प्रबंधन: यद्यपि सरकार वित्तीय दबाव का सामना कर रही है, लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कच्चे तेल व उर्वरक की कीमतों में गिरावट से वित्तीय स्थिति को कुछ राहत मिली है, जिससे राजकोषीय समेकन (fiscal consolidation) को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है।
सिंचाई बफर: जलाशय का भंडारण कम होने के बावजूद, यह सामान्य से 5.7% अधिक है, जिसे वित्त मंत्रालय सिंचाई के लिए एक “सुरक्षित बफर” मानता है।
जल जीवन मिशन का वित्तपोषण: जहां 2025-26 के लिए जल जीवन मिशन का बजट अनुमान संशोधित होकर 17,000 करोड़ रुपये रह गया था, वहीं सरकार ने 2026-27 के लिए इस योजना पर 67,670 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई है।
कृषि नीति में बदलाव: वित्त मंत्रालय ने कृषि नीतियों को फिर से तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया है ताकि जलवायु-अनुकूल फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा सके और अधिक पानी की खपत वाली फसलों को हतोत्साहित किया जा सके।
सरकार अब पानी को एक महत्वपूर्ण वस्तु के रूप में देख रही है जिसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर बफर प्रबंधन की आवश्यकता है। जैसे-जैसे वर्षा के पैटर्न अनिश्चित होते जा रहे हैं, वित्त मंत्रालय का सुझाव है कि भविष्य के जलवायु संबंधी झटकों से कृषि क्षेत्र को बचाने के लिए इन जल बफ़र्स का निर्माण नीति निर्माताओं की सूची में “सबसे ऊपर” होना चाहिए।
क्या आप यह समझना चाहेंगे कि भारत में कृषि के लिए ‘जल बफर’ और ‘जलवायु-अनुकूल खेती’ को लागू करने के लिए कौन सी तकनीकी विधियां अपनाई जा सकती हैं?
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