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4th Jan. 2020 Answer writing

(General Studies III)

  1. Q. Is the current slowdown in Indian economy cyclical or structural?   Critically Analyze (250 words)

Model Answer:

The Indian economy is passing through a phase of economic slowdown, with the GDP growth registering one of the lowest rates of 5.8 per cent in the last quarter of FY19.

The GDP growth rate for the first quarter of FY20 is feared to be lower than 5.8 per cent. While there is a consensus that the economy is slowing down, the debate is still going on whether the slowdown is structural or cyclical.

In simple words, a cyclical economic slowdown is a part of the business cycle having its peaks and low.

The economy will be moving in cycles with periods of peak performance followed by a downturn and then a trough of low activity. These are expected to be short-term problems that could be addressed with an adequate mix of fiscal and monetary policies.

On the other hand, sometimes the problems of the economy can go deeper, impeding the efficient and fair production of goods and services. In such a scenario, a monetary and fiscal stimulus won’t be enough to revive the economy.

Fixing such problems would require the government to undertake some structural policies. The best example in this regard would be the reforms that were carried out to address the crisis in 1991.

Critical Analysis:

The economic growth of any country is driven by a virtuous cycle of savings, investment and exports. Of all the three, investment is considered to be the key driver of growth. To quote the Economic Survey (2019), investment, especially private investment, is the ‘key driver’ that drives demand, creates capacity, increases labour productivity, introduces new technology, allows creative destruction and generates jobs.

The investment rate as measured by Gross Fixed Capital Formation (GFCF) as a per cent of GDP is showing a declining trend.

GFCF as a per cent of GDP has declined from 34.3 per cent in 2011 to 28.8 per cent in 2018.

Similarly, if we consider the GFCF in the private sector, it declined from 26.9 per cent in 2011 to 21.4 per cent in 2018. Likewise, the new investment projects that were announced in 2011 stood at 5,882, whereas it declined to 3,708 in 2018.

 

A similar declining trend is also evident in the case of gross domestic savings as a per cent of GDP. It declined from 32.7 per cent in 2011 to 29.3 per cent in 2018. During the same period, exports as a per cent of GDP also declined from 24.5 per cent to 19.6 per cent.

Thus, the performance of all the three indicators considered to be the major ingredients of a growth story was not satisfactory.

Another major area of concern that is also contributing to the declining savings in the economy is wage growth. The economy is experiencing a declining wage growth (both rural and urban wages).

Other factors-

  • The constant low inflation is good for the consumers but in long term it leads to low demand that would discourage fresh investments & job creation.
  • The slowdown in the economy was further aggravated by the NBFC crisis triggered by the IL&FS default.
  • Demonetization & GST also brought slow down in the economy

Though the present situation in India is not similar to that in 1991, the slowdown is indeed worrying. There is a need to unleash a fresh set of reforms in tax system, wages, Agriculture, Manufacturing, banking, investment (Private/public), labour laws, vocational training system & education system etc that would help India to achieve the target of a $5 trillion economy.

Date- 04/01/2020                                                                                                                       (Dept. of Content Development)


 

Hindi Version 

(General Studies III)

  1. Q. क्या भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूदा मंदी चक्रीय या संरचनात्मक है? आलोचनात्मक विश्लेषण करें / (250 शब्द)

Model Answer:

भारतीय अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है, जीडीपी की वृद्धि वित्त वर्ष 19 की अंतिम तिमाही में 5.8 प्रतिशत की सबसे कम दरों में से एक दर्ज की गई है।

वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही के लिए जीडीपी की वृद्धि दर 5.8 प्रतिशत से कम रहने की आशंका है। हालांकि इस बात पर आम सहमति है कि अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है, बहस अभी भी चल रही है कि मंदी संरचनात्मक है या चक्रीय है।

सरल शब्दों में, एक चक्रीय आर्थिक मंदी व्यापार चक्र का एक हिस्सा है, जिसमे उतार  और चढ़ाव  होता है ।

अर्थव्यवस्था चरम प्रदर्शन की अवधि के साथ चक्रों में आगे बढ़ती है उसके बाद मंदी और कम गतिविधि अनुभव करती है ।

इनसे अल्पकालिक समस्याएं होने की आशंका होती है, जिन्हें राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के पर्याप्त मिश्रण से सही किया जा सकता है।

 दूसरी ओर, कभी-कभी अर्थव्यवस्था की समस्याएं गहरी हो सकती हैं, जिससे वस्तुओं  और सेवाओं का कुशल और उचित उत्पादन बाधित होता है। ऐसे परिदृश्य में, एक मौद्रिक और राजकोषीय प्रोत्साहन अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

इस तरह की समस्याओं को ठीक करने के लिए सरकार को कुछ संरचनात्मक नीतियां बनाने की आवश्यकता होगी। इस संबंध में सबसे अच्छा उदाहरण 1991 में संकट को दूर करने के लिए किए गए सुधार होंगे।

आलोचनात्मक विश्लेषण

किसी भी देश की आर्थिक वृद्धि बचत, निवेश और निर्यात के virtuous चक्र से प्रेरित होता है । तीनों में से, निवेश को विकास का प्रमुख चालक माना जाता है।

आर्थिक सर्वेक्षण (2019) के अनुसार, निवेश, विशेष रूप से निजी निवेश, ‘प्रमुख चालक’ है जो मांग, क्षमता एवं श्रम उत्पादकता को बढ़ाता है, नई तकनीक लाता है और रोजगार पैदा करता है।

जीडीपी के एक प्रतिशत के रूप में सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) द्वारा मापी गई निवेश दर में गिरावट देखी जा रही है।

जीडीपी के एक प्रतिशत के रूप में जीएफसीएफ 2011 में 34.3 प्रतिशत से घटकर 2018 में 28.8 प्रतिशत हो गया है।

इसी तरह, अगर हम निजी क्षेत्र में जीएफसीएफ पर विचार करते हैं, तो यह 2011 में 26.9 प्रतिशत से घटकर 2018 में 21.4 प्रतिशत हो गया। इसी तरह, 2011 में घोषित की गई नई निवेश परियोजनाएं 5,882 थी, जबकि यह 2018 में घटकर 3,88 रह गई

जीडीपी के एक प्रतिशत के रूप में सकल घरेलू बचत के मामले में भी इसी तरह की गिरावट की प्रवृत्ति स्पष्ट है। 2011 में यह 32.7 प्रतिशत से घटकर 2018 में 29.3 प्रतिशत हो गया। इसी अवधि के दौरान जीडीपी के एक प्रतिशत के रूप में निर्यात भी 24.5 प्रतिशत से घटकर 19.6 प्रतिशत रह गया।

इस प्रकार, विकास के प्रमुख घटक माने जाने वाले तीनों संकेतकों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था।
चिंता का एक अन्य प्रमुख क्षेत्र जो अर्थव्यवस्था में घटती बचत में भी योगदान दे रहा है, वह है वेतन वृद्धि। अर्थव्यवस्था में मजदूरी में वृद्धि (ग्रामीण और शहरी दोनों मजदूरी) का अनुभव हो रहा है।

अन्य कारक

  • निरंतर कम मुद्रास्फीति उपभोक्ताओं के लिए अच्छा है लेकिन लंबी अवधि में यह कम मांग की ओर जाता है जो नए निवेश और रोजगार सृजन को हतोत्साहित करेगा।
  • अर्थव्यवस्था में मंदी एनबीएफसी संकट के कारण आईएल एंड एफएस डिफॉल्ट के कारण बढ़ गई थी। अर्थव्यवस्था में डिमोनेटाइजेशन और जीएसटी ने भी मंदी ला दी

यद्यपि 1991 में भारत की वर्तमान स्थिति इसके समान नहीं है, लेकिन मंदी वास्तव में चिंताजनक है। कर प्रणाली, मजदूरी, कृषि, विनिर्माण, बैंकिंग, निवेश (निजी / सार्वजनिक), श्रम कानूनों, व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रणाली और शिक्षा प्रणाली आदि में सुधारों के एक नए सेट को उजागर करने की आवश्यकता है जो भारत के $ 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करेंगे।

Date- 04/01/2020                                                                                                                                    (Dept. of Content Development)

 

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