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डेली करेंट अफेयर्स 2019

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ & कैलिफोर्निया का असेंबली बिल 5 (AB5)

12th September 2019

समाचार में क्यों?    भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” योजना के लिए किये गये उत्तम कार्य के लिए कुछ राज्यों और जिलों को सम्मानित किया है।

मुख्य तथ्य:

  • हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को जन्म लिंगानुपात में सुधार के लिए सम्मानित किया गया।
  • जन्म लिंगानुपात में सुधार के लिए दस जिलों को भी सम्मानित किया गया।
  • बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना ¼BBBP)
  • बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना ¼BBBP) जनवरी 2015 में आरम्भ की गई थी।
  • इस योजना में केंद्र सरकार के कार्यान्वयन में तीन मंत्रालय सहयोग ¼tri-ministerial effort½ करते हैं। ये मंत्रालय हैं – महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय।
  • इस योजना का उद्देश्य लैंगिक समानता तथा लड़कियों की पढ़ाई के महत्त्व को बढ़ावा देना है।
  • योजना का लक्ष्य शिशु लिंग अनुपात में सुधार लाना है। इसके लिए सरकार की ओर से कई क्षेत्रों में सुधारात्मक प्रयास किये जाएँगे, जैसे – लोगों को यह पता लाने से रोकना कि गर्भस्त शिशु लड़की है या लड़का, बच्चियों की शिक्षा को बढ़ावा देना तथा उनको हर प्रकार से सशक्त करना।

योजना की महत्ता और आवश्यकता:

  • 1961 से भारत में लगातार शिशु लिंग अनुपात ¼child sex ratio½ गिरता जा रहा है। 1991 में यह अनुपात 945 था जो घटकर 2001 में 927 हो गया और आगे चल कर 2011 में 918 हो गया। यह गिरावट खतरनाक है। लिंग अनुपात की इस गिरावट के कई मूलभूत कारण हैं, जैसे – समाज में लड़कियों के प्रति भेदभाव की परम्परा, लिंग के निर्धारण के लिए उपकरणों का सरलता से उपलब्ध होना, उनका सस्ता होना और उनका दुरूपयोग किया जाना।

शिशु लिंग अनुपात :

शिशु लिंग अनुपात ¼Child Sex Ratio – CSR½ 0 से 6 वर्ष के बच्चों में प्रत्येक एक हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या को कहते हैं। इसलिए इस अनुपात में गिरावट को स्त्रियों की अशक्तता का एक बहुत बड़ा संकेत माना जाता है। यह अनुपात इस सच्चाई को भी प्रतिबिम्बित करता है कि लिंग निर्णय के द्वारा गर्भ में ही बच्चियों के साथ भेद-भाव होता है और उनके जन्म के उपरान्त भी वे भेद-भाव की शिकार होती हैं।

 

 

Topic:  For prelims and mains:

कैलिफोर्निया का असेंबली बिल 5 (AB5)

समाचार में क्यों?    कैलिफोर्निया (California) की ‘गिग इकॉनमी’(Gig Economyको झटका देते हुए राज्य के नीति निर्माताओं ने एक ऐतिहासिक विधेयक पारित किया है। कैलिफोर्निया के इस नए विधेयक को असेंबली बिल 5 (Assembly Bill 5-AB5) नाम दिया गया है।

कैलिफोर्निया का विधेयक:

  • कैलिफोर्निया का यह विधेयक राज्य की सभी फर्मों के लिये यह अनिवार्य बनाता है कि वे अपने स्वतंत्र ठेकेदारों (Independent Contractors) को कर्मचारी के रूप में वर्गीकृत करें।
  • अनुमानतः यह विधेयक राज्य के 1 मिलियन लोगों को प्रभावित करेगा, जो आउटसोर्सिंग (Outsourcing) और फ्रेंचाइजिंग (Franchising) के कार्य में लंबे समय से लगे हुए हैं।
  • राज्य के बहुत से लोग वास्तविक कर्मचारी न होने के कारण न्यूनतम मजदूरी और बेरोजगारी बीमा जैसी बुनियादी सुरक्षा के अभाव में कार्य कर रहे हैं।
  • यह विधेयक कैलिफोर्निया में कार्य कर रही सभी एप (App) आधारित कंपनियों जैसे- उबर इत्यादि पर लागू होगा।

‘गिग इकॉनमी’ का आशय:

  • लगातार डिजिटल हो रहे विश्व में रोजगार की परिभाषा और कार्य का स्वरूप भी बदल रहा है। एक नई वैश्विक अर्थव्यवस्था उभर रही है, जिसको नाम दिया जा रहा है ’गिग इकॉनमी’। दरअसल, गिग इकॉनमी में फ्रीलान्स कार्य और एक निश्चित अवधि के लिये प्रोजेक्ट आधारित रोजगार शामिल हैं।
  • गिग इकॉनमी में किसी व्यक्ति की सफलता उसकी विशिष्ट निपुणता पर निर्भर करती है। असाधारण प्रतिभा, गहरा अनुभव, विशेषज्ञ ज्ञान या प्रचलित कौशल प्राप्त श्रम-बल ही ‘गिग इकॉनमी’ में कार्य कर सकता है।
  • आज कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी कर सकता है या किसी प्राइवेट कंपनी में कार्य कर सकता है या फिर किसी मल्टीनेशनल कंपनी में रोजगार ढूँढ सकता है, लेकिन ‘गिग इकॉनमी’ एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार काम कर सकता है।
  • यह भी कहा जा सकता है कि गिग इकॉनमी में कंपनी द्वारा तय समय में प्रोजेक्ट पूरा करने के एवज में भुगतान किया जाता है, इसके अतिरिक्त किसी भी चीज से कंपनी का कोई मतलब नहीं होता।

‘गिग इकॉनमी’ के फायदे:

  • कार्य में लचीलापन: पारंपरिक कर्मचारियों के विपरीत, गिग श्रमिकों को यह चुनाव करने की स्वतंत्रता होती है कि वे क्या कार्य करना चाहते हैं, किस प्रकार करना चाहते हैं, कब करना चाहते हैं एवं कहाँ करना चाहते हैं। घर से कार्य करने में सक्षम होने के कारण वे अपने कार्य और निजी जीवन में आवश्यक संतुलन भी स्थापित कर पाते हैं।
  • कार्य में विविधता: गिग श्रमिक प्रतिदिन कई प्रकार के कार्य करते हैं और कई प्रकार के लोगों के साथ कार्य करते हैं, जिससे उनके कार्य में विविधता बनी रहती है।
  • श्रम लागत में कमी: यदि सेवा प्रदाताओं के दृष्टिकोण से देखें तो ‘गिग इकॉनमी’ काफी मितव्ययी है, क्योंकि इसमें एक सेवा प्रदाता अपनी आवश्यकतानुसार, किसी भी समय गिग श्रमिक को नियुक्त कर सकता है और उसे मासिक वेतन देने की भी आवश्यकता नहीं होती।

 

‘गिग इकॉनमी’ के नुकसान:

  • श्रमिकों के लिये बुनियादी सुविधाओं का अभाव: गिग श्रमिकों को सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि उन्हें पारंपरिक श्रमिकों के इतर किसी भी प्रकार की बुनियादी सुविधाएँ जैसे- न्यूनतम मजदूरी और बेरोजगारी बीमा आदि नहीं मिल पाती हैं।
  • रोजगार की अस्थायी प्रकृति: चूँकि ‘गिग इकॉनमी’ में कार्य करने वाले सभी श्रमिक अस्थायी रूप से नियुक्त किये जाते हैं। अतः उनके समक्ष सदैव यह स्थिति बनी रहती है कि वे किसी भी समय आर्थिक संकट का सामना कर सकते हैं।
  • प्रशिक्षण और कौशल विकास के अवसरों की कमीः सभी कंपनियाँ अपनी उत्पादकता को बढ़ाने के लिये अपने कर्मचारियों को समय-समय पर उचित प्रशिक्षण और कौशल विकास के अवसर प्रदान करती हैं, परंतु चूँकि गिग श्रमिक कंपनियों के स्थायी कर्मचारी नहीं होते इसलिये उन्हें इस प्रकार का कोई भी अवसर प्राप्त नहीं होता।

भारत और गिग इकॉनमी:

  • वर्ष 2017 में अमेरिका में जहाँ श्रम शक्ति का 31 प्रतिशत भाग गिग इकॉनमी के तहत कार्य कर रहा था वहीं भारत में यह आँकड़ा 75 प्रतिशत था, परंतु वर्तमान में भी दोनों देशों के आर्थिक परिदृश्यों में बहुत अधिक अंतर है।
  • अमेरिका में 31 प्रतिशत श्रम गिग इकॉनमी में इसलिये कार्य कर रहे थे, क्योंकि वे सक्षम थे जबकि भारत में बड़ी संख्या में लोग इस व्यवस्था का हिस्सा इसलिये थे क्योंकि उनके पास कोई एनी विकल्प नहीं था। यहाँ यह जानना भी महत्त्वपूर्ण है कि दैनिक मजदूरी करने वालों को भी गिग इकॉनमी का ही हिस्सा माना जाता है।
  • भारत में 40 प्रतिशत लोग इतना ही कमा पाते हैं कि वे दो वक्त की रोटी खा सकें। बचत के नाम पर उनके पास कुछ भी नहीं है और वे लगातार गरीबी में जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं।
  • अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण के कारण और भी लोग गिग इकॉनमी का हिस्सा बनने को मजबूर हो गए हैं जिसके कारण उसके समक्ष अस्थायी रोजगार का संकट और गहरा गया है।
  • ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक अकेले अमेरिका में अगले दो दशकों में डेढ़ लाख रोजगार खत्म हो जाएंगे। अमेरिका में तो मानव संसाधन इतना दक्ष है कि उसे गिग इकॉनमी का हिस्सा बनने में कोई समस्या नहीं आएगी, लेकिन भारत में यह स्थिति नहीं है।

 

प्रीलिम्स के लिए तथ्य:

Project Bal Basera :

  • बाल बसेरा ऋषिकेश में स्थित AIIMS के निर्माण कार्यस्थल पर काम कर रहे मजदूरों के बच्चों के लिए क्रेच की एक योजना है जिसमें केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग ¼CPWD½ सहयोग कर रहा है।

इस बाल बसेरे में 35 बच्चे रहेंगे और इसका संचालन ¼CPWD½  के अधिकारियों की पत्नियों का संघ कर रहा है।

 

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