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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

फसल बीमा योजना

समाचार में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फसल बीमा योजनाओं को नवीन सुधारों के साथ पुन: प्रारंभ करने की मंज़ूरी दी है।

  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana-PMFBY) और ‘पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (Restructured Weather Based Crop Insurance Scheme-RWBCIS) दोनों में सुधार किये गए हैं।
  • इन सुधारों का उद्देश्य फसल बीमा योजनाओं के कार्यान्वयन में आने वाली मौजूदा चुनौतियों का समाधान करना है।
  • केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ विचार-विमर्श कर और सभी हितधारकों के इनपुट के आधार पर इन योजनाओं में बदलाव किये हैं।

निम्नलिखित मापदंडों/प्रावधानों को संशोधित करने का प्रस्ताव:

  • फसल बीमा योजनाओं की मौजूदा सब्सिडी की प्रीमियम दर को (वर्ष 2020 के खरीफ फसल से) 50% से घटाकर सिंचित क्षेत्रों में 25% और असिंचित क्षेत्रों के लिये 30% तक कर दिया जाएगा।
  • मौजूदा फसल ऋण वाले किसानों सहित सभी किसानों के लिये इन उपर्युक्त योजनाओं में नामांकन को स्वैच्छिक कर दिया है, जबकि 2016 में जब PMFBY योजना प्रारंभ की गई थी तब सभी फसल ऋण धारकों के लिये इस योजना के तहत बीमा कवर हेतु नामांकन करवाना अनिवार्य था।

योजनाओं में अन्य बदलाव:

  • बीमा कंपनियों इन योजनाओं में केवल तीन वर्ष तक व्यवसाय कर सकेगी।
  • राज्यों/संघशासित राज्यों को अतिरिक्त जोखिम कवर/सुविधाओं के चयन का विकल्प प्रदान करने के साथ ही योजना को लागू करने में लचीलापन प्रदान किया जाएगा।
  • उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिये प्रीमियम सब्सिडी दर को 90% तक बढ़ाया जाएगा।
  • योजना के लिये आवंटित कुल राशि का कम-से-कम 3% खर्च प्रशासनिक कार्यों पर किया जाएगा।

बदलाव का उद्देश्य:

  • किसान बेहतर तरीके से कृषि उत्पादन जोखिम का प्रबंधन करने और कृषि आय को स्थिर करने में सफल होंगे।
  • इन बदलाओं के बाद उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में बीमा कवरेज बढे़गा, जिससे इन राज्यों के किसान बेहतर तरीके से कृषि जोखिम का प्रबंधन कर सकेंगे।
  • इन परिवर्तनों के बाद त्वरित और सटीक उपज अनुमान प्राप्त करना संभव हो पाएगा जो बीमा दावों के निपटान में मदद करेगा।
  • उपर्युक्त दोनों योजनाओं में नामांकित 58% किसान ऐसे हैं जिन्हें अब बीमा कवर नामांकन के लिये बाध्य नहीं होना पड़ेगा।

सुधारों का संभावित प्रभाव:

  • सरकारी आँकड़ों के अनुसार PMFBY योजना के तहत फसल बीमा कवरेज केवल 30% है तथा इसके तहत नामांकित किसानों की इस संख्या में नवीन सुधारों के बाद और भी कमी आ सकती है।
  • वर्तमान में केंद्र और राज्य के प्रीमियम योगदान का अनुपात 50:50 है, अत: इन सुधारों के बाद राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा।

योजनाओं के साथ जुड़ी समस्याएँ:

  • विभिन्न हितधारकों का आरोप है कि योजना का अधिकांश लाभ निजी बीमा कंपनियों को प्राप्त हुआ है, किसानों को इसका बहुत कम लाभ मिला है।
  • कुछ बीमा कंपनियाँ यथा- आईसीआईसीआई लोम्बार्ड (ICICI Lombard), टाटा एआईजी (Tata AIG) सहित कई प्रमुख बीमा कंपनियाँ वर्ष 2019-20 में योजना से बाहर हो गई थीं। इन कंपनियों का कहना था कि उच्च फसल बीमा दावों के अनुपात की वजह से उनको काफी नुकसान हो रहा था।
  • पंजाब और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों ने पहले ही इस योजना में भाग लेने से इनकार कर दिया है।
  • केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि फसल बीमा योजनाओं का अंतिम उद्देश्य किसानों की आय को दोगुना करना होना चाहिये।

भारत के 22वें विधि आयोग

समाचार में क्यों? 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 वर्ष की अवधि के लिये भारत के 22वें विधि आयोग (22nd Law Commission of India) को मंज़ूरी दे दी।

निकाय की स्थिति:

  • भारतीय विधि आयोग न तो एक संवैधानिक निकाय है और न ही वैधानिक निकाय। यह भारत सरकार के आदेश से गठित एक कार्यकारी निकाय है। यह प्रमुख रूप से कानूनी सुधारों हेतु कार्य करता है।
  • आयोग का गठन एक निर्धारित अवधि के लिये होता है और यह विधि और न्याय मंत्रालय के लिये परामर्शदाता निकाय के रूप में कार्य करता है।

सांगठनिक ढाँचा:

  • 22वें विधि आयोग का गठन, आधिकारिक गजट में सरकारी आदेश के प्रकाशन की तिथि से 3 वर्ष की अवधि के लिये किया जाएगा। इसमें निम्मलिखित शामिल होंगे‑

एक पूर्णकालिक अध्यक्ष

  • चार पूर्णकालिक सदस्य (सदस्य-सचिव सहित)
  • सचिव, कानूनी मामलों के विभाग पदेन सदस्य के रूप में
  • सचिव, विधायी विभाग पदेन सदस्य के रूप में
  • अधिक-से-अधिक पाँच अंशकालिक सदस्य
  • इसका अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होगा।

विधि आयोग: संक्षिप्त में

  • प्रथम आयोग का गठन वर्ष 1834 में चार्टर एक्ट- 1833 के तहत लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में किया गया था जिसने दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता को संहिताबद्ध करने की सिफारिश की।
  • भारत सरकार ने स्वतंत्र भारत का प्रथम विधि आयोग वर्ष 1955 में भारत के तत्कालीन अटॉर्नी जनरल एम.सी. शीतलवाड़ की अध्यक्षता में गठित किया। तब से 21 विधि आयोग गठित किये जा चुके हैं जिनमें से प्रत्येक का कार्यकाल 3 वर्ष था।
  • 21वें विधि आयोग जिसकी अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी. एस. चौहान द्वारा की गई, ने 31 अगस्त, 2018 को अपना तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा किया था।

भारतीय विधि आयोग निम्न कार्य करेगा:

  • यह ऐसे कानूनों की पहचान करेगा जिनकी अब कोई जरूरत नहीं है या वे अप्रासंगिक हो चुके हैं और जिन्हें तुरंत निरस्त किया जा सकता है।
  • राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के संदर्भ में मौजूदा कानूनों की जाँच करना तथा सुधार के सुझाव देना और नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिये आवश्यक कानूनों के बारे में सुझाव देना एवं संविधान की प्रस्तावना में निहित उद्देश्यों को प्राप्त करना।
  • कानून और न्यायिक प्रशासन से संबंधित किसी भी विषय पर विचार करना और सरकार को अपने विचारों से अवगत कराना जिसे सरकार के विधि और न्याय मंत्रालय (कानूनी मामलों के विभाग) द्वारा विशेष रूप से संदर्भित किया जा सकता है।
  • विश्व के देशों को अनुसंधान प्रदान करने के अनुरोधों पर विचार करना क्योंकि इसे सरकार द्वारा कानून और न्याय मंत्रालय के माध्यम से संदर्भित किया जा सकता है।
  • वे सभी उपाय करना जो गरीबों की सेवा में कानून और कानूनी प्रक्रिया के लिये आवश्यक हो सकते हैं।
  • सामान्य महत्त्व के केंद्रीय अधिनियमों को संशोधित करना ताकि उन्हें सरल बनाया जा सके और उनकी विसंगतियों, अस्पष्टताओं एवं असमानताओं को दूर किया जा सके।
  • अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले आयोग नोडल मंत्रालयों/विभागों तथा ऐसे अन्य हितधारकों के साथ परामर्श करेगा जिन्हें वह इस उद्देश्य के लिये आवश्यक समझे।

 

 

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