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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

फरक्का बैराज में ‘लॉक’ और हिल्सा मछली: आशाएं और आशंका

G.S. Paper-III

संदर्भ:

फरवरी 2019 में, सरकार ने हिल्सा मछलियों के लिए एक ‘फिश पास’ / मछली मार्ग (fish pass) बनाने हेतु 360 करोड़ रुपये की लागत से फरक्का बैराज पर ‘नेविगेशन लॉक’ को फिर से डिज़ाइन करने के लिए एक परियोजना का अनावरण किया था।

फरक्का में निर्मित किये जाने वाले ‘फिश पास’ को ‘मछली मार्ग’ या ‘फिश लैडर’ भी कहा जाता है, इसका उद्देश्य बांधों और बैराज के कारण होने अवरोधों को पार करने में मछलियों की सहायता करना है।

हिल्सा मछली प्रवासन (Hilsa fish migration):

  1. वैज्ञानिक भाषा में, हिल्सा (Tenualosa ilisha- तेनुआलोसा इलिशा) एक समुद्रापगामी / एनाड्रोमस (anadromous) मछली है।
  2. अर्थात्, इसका अधिकांश जीवन समुद्र में बीतता है लेकिन बरसात के मौसम या प्रजनन के समय यह नदी और समुद्र के मुहाने पर पर आ जाती है, जहाँ भारत और बांग्लादेश की नदियाँ बंगाल की खाड़ी से मिलती हैं।
  3. मछलियों के समूहों (shoal) का एक बड़ा भाग पद्मा और गंगा में ऊपर की ओर प्रवास करता है, कुछ मछलियों के समूह, गोदावरी की ओर भी प्रवास करने के लिए जाने जाते है, इसके अलावा, कावेरी नदी में भी हिल्सा प्रवास के साक्ष्य मिलते हैं।

मछलियों की आवाजाही पर असर:

  1. ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि वर्ष 1970 तक हिलसा गंगा नदी में प्रयागराज से आगरा तक तैरती थी।
  2. वर्ष 1975 में गंगा पर बने फरक्का बैराज ने हिल्सा के पश्चिम की ओर बढ़ने वाले मार्ग को बाधित कर दिया।
  3. फरक्का बैराज में एक ‘नेविगेशन लॉक’ लगाया गया था जिसके कारण मछलियों के फरक्का से आगे तैरने में बाधा उत्पन्न होने लगी थी।

‘फिश लैडर’ (fish ladders) क्या होते हैं?

ये, सामान्यतः छोटी-छोटी सीढ़ियों से बने होते हैं, जिनके सहारे मछलियाँ बाधाओं को पार करने और दूसरी तरफ खुले पानी तक पहुँचने में सक्षम होती हैं।

इस विधि के सुचारू रूप से काम करने के लिए, इन सीढ़ियों पर बहने वाले पानी को नियंत्रित करना होता है। इन सीढ़ियों पर जल का प्रवाह और मात्रा इतनी होनी चाहिए कि मछलियों को आकर्षित कर सके, किंतु इतनी भी नहीं होनी चाहिए, कि वे इसमें तैरने से बचें।

प्री के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

थोलपावाक्कूथु

  1. इसे छाया कठपुतली, निज़लक्कूथु और ओलाक्कूथु भी कहा जाता है।
  2. यह केरल की एक पारंपरिक मंदिर-कला है, जिसका उद्गम पलक्कड़ और पड़ोसी क्षेत्रों में हुआ था।
  3. इस कला में पलक्कड़ के भद्रकाली मंदिरों में रामायण की कथाओं का प्रदर्शन किया जाता है।
  4. इसमें, एजुपारा, चेंडा और मद्दालम आदि उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
  5. इस कला रूप में महारत हासिल करने के लिए कलाकारों को कई वर्षों के कठोर प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है।
  6. इस कठपुतली का मंचन मंदिर परिसर में कूथुमदम (Koothumadam) नामक एक विशेष मंच पर होता है।

 

 

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