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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

नई राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति की ओर

समाचार में क्यों \       28 अगस्त, 2019 को नई दिल्ली में ‘नई राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति की ओर’ (Towards New National Cyber Security Strategy) विषय पर 12वें भारतीय सुरक्षा सम्मेलन का आयोजन किया गया।

सम्मेलन के प्रमुख विषय :

  • सम्मेलन के दौरान महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय आधारभूत ढाँचों की सुरक्षा, उभरते साइबर खतरों, घटनाओं, चुनौतियों एवं प्रतिक्रिया जैसे कई विषयों पर चर्चा की गई।
  • साथ ही इस विषय पर भी ध्यान केंद्रित किया गया कि डिजिटल संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में परिवर्तित हो रही है। हर प्रौद्योगिकी की अपनी उपयोगिता है, इसी तरह साइबर प्रौद्योगिकी में इन दिनों बड़ी तेज़ी आई है। लेकिन एक वरदान होने के साथ ही यह प्रौद्योगिकी एक बड़ा खतरा भी बन गई है।

साइबर अपराध क्या है?

  • साइबर अपराध ऐसे गैर-काननी कार्य हैं जिनमें कंप्यूटर एवं इंटरनेट नेटवर्क का प्रयोग एक साधन अथवा लक्ष्य अथवा दोनों के रूप में किया जाता है। ऐसे अपराधों में हैकिंग, चाइल्ड पॉर्नोग्राफी, साइबर स्टॉकिग, सॉफ्टवेयर पाइरेसी, क्रेडिट कार्ड फ्रॉड, फिशिंग आदि को शामिल किया जाता है।

साइबर अपराधों से निपटने की दिशा में भारत के प्रयास :

  • भारत में ‘सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000’ पारित किया गया जिसके प्रावधानों के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता के प्रावधान सम्मिलित रूप से साइबर अपराधों से निपटने के लिये पर्याप्त हैं।
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धाराएँ 43, 43ए, 66, 66बी, 66सी, 66डी, 66ई, 66एफ, 67, 67 ए, 67 बी, 70, 72, 72 ए और 74 हैकिंग और साइबर अपराधों से संबंधित हैं।
  • सरकार ने साइबर सुरक्षा से संबंधित फ्रेमवर्क का अनुमोदन किया है और इसके लिये राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय को नोडल एजेंसी बनाया गया है।
  • राष्ट्रीय विशिष्ट अवसंरचना और विशिष्ट क्षेत्रों में साइबर सुरक्षा के लिये राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी अनुसंधान संगठन को नोडल एजेंसी बनाया गया है।
  • इसके अंतर्गत 2 वर्ष से लेकर उम्रकैद तथा दंड अथवा ज़ुर्माने का भी प्रावधान है। सरकार द्वाराराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति, 2013’ जारी की गई जिसके तहत सरकार ने अति-संवेदनशील सूचनाओं के संरक्षण के लिये ‘राष्ट्रीय अतिसंवेदनशील सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (National Critical Information Infrastructure protection centre-NCIIPC) का गठन किया।
  • सरकार द्वाराकंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (CERT-In)’ की स्थापना की गई जो कंप्यूटर सुरक्षा के लिये राष्ट्रीय स्तर की मॉडल एजेंसी है।
  • विभिन्न स्तरों पर सूचना सुरक्षा के क्षेत्र में मानव संसाधन विकसित करने के उद्देश्य से सरकार नेसूचना सुरक्षा शिक्षा और जागरूकता (Information Security Education and Awareness: ISEA) परियोजना प्रारंभ की है।
  • भारत सूचना साझा करने और साइबर सुरक्षा के संदर्भ में सर्वोत्तम कार्य प्रणाली अपनाने के लिये अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसे देशों के साथ समन्वय कर रहा है।
  • अंतर-एजेंसी समन्वय के लिये ‘भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र’ (Indian Cyber Crime Co-ordination Centre-I4C) की स्थापना की गई है।
  • देश में साइबर अपराधों से समन्वित और प्रभावी तरीके से निपटने के लिए ‘साइबर स्वच्छता केंद्र’ भी स्थापित किया गया है। यह इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology-MeitY) के तहत भारत सरकार की डिजिटल इंडिया मुहिम का एक हिस्सा है।
  • भारत इंटरनेट का तीसरा सबसे बड़ा उपयोगकर्त्ता है और हाल के वर्षों में साइबर अपराध कई गुना बढ़ गए हैं। साइबर सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिये सरकार की ओर से कई कदम उठाए गए हैं। कैशलेस अर्थव्यवस्था को अपनाने की दिशा में बढ़ने के कारण भारत में साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। डिजिटल भारत कार्यक्रम की सफलता काफी हद तक साइबर सुरक्षा पर निर्भर करेगी अतः भारत को इस क्षेत्र में तीव्र गति से कार्य करना होगा।

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Topic:  For prelims and mains:

चीनी निर्यात सब्सिडी को सहमति :

समाचार में क्यों \       प्रधानमंत्री की अध्‍यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने गन्‍ना सीज़न 2019-20 के दौरान चीनी मिलों के लिये 10,448 रुपए प्रति मीट्रिक टन की दर से निर्यात सब्सिडी प्रदान करने के लिये मंज़ूरी दे दी है। इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिये कुल अनुमानित व्‍यय लगभग 6,268 करोड़ रुपए होगा।

प्रमुख बिंदु

  • गन्‍ना सीज़न 2019-20 के लिये एकमुश्‍त निर्यात सब्सिडी आवाजाही, उन्‍नयन तथा प्रक्रिया संबंधी अन्‍य लागतों, अंतर्राष्‍ट्रीय और आंतरिक परिवहन की लागतों और निर्यात पर ढुलाई शुल्कों सहित लागत व्‍यय को पूरा करने के लिये अधिकतम 60 लाख मीट्रिक टन चीनी के निर्यात पर अधिकतम मान्‍य निर्यात मात्रा के लिये चीनी मिलों को आवंटित की जाएगी।
  • चीनी मिलों द्वारा गन्‍ने की बकाया राशि किसानों के बैंक खाते में, सब्सिडी की राशि सीधे तौर पर जमा कराई जाएगी और यदि कोई शेष बकाया राशि होगी तो चीनी मिल के खाते में जमा कराई जाएगी।
  • कृषि समझौते की धारा1 (D) और (E) के प्रावधानों तथाविश्व व्यापार संगठन (WTO) के प्रावधानों के अनुसार सब्सिडी दी जाएगी।
  • गन्‍ना सीज़न 2017-18 (अक्‍तूबर-सितंबर) और गन्‍ना सीज़न 2018-19 के दौरान चीनी के अतिरिक्‍त उत्‍पादन को ध्‍यान में रखते हुए, सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्‍न कदमों से भिन्‍न, मौजूदा गन्‍ना सीज़न 2019-20 में लगभग 142 लाख मीट्रिक टन चीनी का खुला भंडार होगा और सीज़न के अंत में लगभग 162 लाख मीट्रिक टन भंडार होने का अनुमान है।
  • चीनी के 162 लाख मीट्रिक टन के अतिरिक्‍त भंडार से गन्‍ने के मूल्‍यों पर पूरे सीज़न में प्रतिकूल दबाव पैदा होगा जिससे किसानों के गन्‍ने की बकाया धनराशि के भुगतान में चीनी मिलों को कठिनाई होगी।
  • इस स्थिति से निपटने के लिये सरकार ने हाल में 1 अगस्‍त, 2019 से एक वर्ष के लिये चीनी का 40 लाख मीट्रिक टन बफर भंडार तैयार किया है।
  • हालाँकि 31 जुलाई, 2020 तक इस बफर भंडार और गन्‍ना सीज़न 2019-20 के दौरान बी-हेवी मोलेस/गन्‍ना रस से इथानॉल के उत्‍पादन द्वारा चीनी पर संभावित प्रभाव तथा दो महीने के लिये मानक भंडार की ज़रूरत को ध्‍यान में रखते हुए, चीनी का लगभग 60 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्‍त भंडार होगा, जिसका निपटारा निर्यात के माध्‍यम से करना होगा।

लाभ:

  • चीनी मिलों की तरलता में सुधार होगा।
  • चीनी इंवेन्ट्री में कमी आएगी।
  • घरेलू चीनी बाज़ार में मूल्य भावना बढ़ाकर चीनी की कीमतें स्थिर की जा सकेंगी और परिणामस्वरूप किसानों के बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान समय से किया जा सकेगा।
  • चीनी मिलों के गन्ना मूल्य बकायों की मंज़ूरी से सभी गन्ना उत्पादक राज्यों में चीनी मिलों को लाभ होगा।

पृष्ठभूमि:

  • भारत विश्व में ब्राज़ील के बाद चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक एवं सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है।
  • देश की वार्षिक चीनी खपत का लगभग 90% हिस्सा वाणिज्यिक कार्यों जैसे कि पैकेज खाद्य पदार्थ आदि के लिये उपयोग किया जाता है।
  • चीनी मिलें जिस मूल्य पर किसानों से गन्ना खरीदती हैं उसे उचित और लाभप्रद मूल्य (Fair and Remunerative Price-FRP) कहा जाता है। इसका निर्धारण कृषि लागत और मूल्य आयोग (Commission on Agricultural Costs and Prices-CACP) की सिफारिशों के आधार पर किया जा

 प्रीलिम्स के लिए तथ्य:

v साइट्स CITES:

  • CITES (The Convention of International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) वन्यजीवों और वनस्पतियों की संकटापन्न प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर देशों के बीच एक समझौता है।
  • यह समझौता 1 जुलाई, 1975 से लागू है। लेकिन भारत इस समझौते के लागू होने के लगभग एक साल बाद 18 अक्तूबर, 1976 को इसमें शामिल हुआ और इस समझौते में शामिल होने वाला 25वाँ सदस्य बना।
  • वर्तमान में CITES के पक्षकारों की संख्या 183 है

समझौते के तहत संकटापन्न प्रजातियों को तीन परिशिष्टों में शामिल किया जाता है:

  • परिशिष्ट I: इसमें शामिल प्रजातियाँ ‘लुप्तप्राय’ हैं, जिन्हें व्यापार से और भी अधिक खतरा हो सकता है।
  • परिशिष्ट II: इसमें ऐसी प्रजातियाँ शामिल हैं जिनके निकट भविष्य में लुप्त होने का खतरा नहीं नहीं है लेकिन ऐसी आशंका है कि यदि इन प्रजातियों के व्यापार को सख्त तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया तो ये लुप्तप्राय की श्रेणी में आ सकती हैं।

परिशिष्ट III: इसमें वे प्रजातियाँ शामिल हैं जिसकी किसी एक पक्ष/देश द्वारा नियंत्रण/संरक्षण के लिये पहचान की गई है। इस परिशिष्ट में शामिल प्रजातियों के व्यापार को नियंत्रित करने के लिये दूसरे पक्षों का सहयोग अपेक्षित है।

 

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