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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

तीन कृषि विधेयक एवं संबंधित विवाद

29th September, 2020

G.S. Paper-II (National)

संदर्भ: हाल ही में संसद द्वारा पारित किए गए तीन कृषि विधेयकों का कई राज्यों में किसानों द्वारा विरोध किया जा रहा है।

चर्चा का विषय:

जून 2020 में, केंद्र सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार करने हेतु तीन अध्यादेश जारी किये गए थे। ये अध्यादेश निम्नलिखित है:

  1. आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश 2020
  2. कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020
  3. मूल्य आश्वासन पर किसान समझौता (अधिकार प्रदान करना और सुरक्षा) और कृषि सेवा अध्यादेश 2020

परंतु, किसान कार्यकर्ताओं को इन अध्यादेशों से निराशा हुई है, इनका कहना है, कि यह सुधार पैकेज किसानों की समस्याओं को हल करने के बजाय इनकी समस्याओं में और वृद्धि करेंगे।

संबंधित चिंताएँ:

  1. ये अध्यादेश किसान विरोधी हैं, तथा इसके परिणामस्वरूप किसानों के लिए फसलों की कीमतें घटेंगी तथा बीज सुरक्षा समाप्त हो जायेगी।
  2. सरकार का हस्तक्षेप समाप्त होने से खाद्य सुरक्षा भी ख़त्म हो जायेगी।
  3. ये अध्यादेश, भारतीय खाद्य और कृषि प्रणालियों पर कॉर्पोरेट नियंत्रण को बढ़ावा देते हैं।
  4. ये किसानों के शोषण तथा जमाखोरी और कालाबाजारी को भी बढ़ावा देंगे।

अध्यादेशों पर चर्चा:

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020:

मुख्य प्रावधान: इस संशोधन के अंतर्गत अकाल, युद्ध, आदि जैसी असामान्य परिस्थितियों के कारण कीमतों में अत्याधिक वृद्धि तथा प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में कुछ निर्दिष्ट कृषि उपजों की आपूर्ति, भंडारण तथा कीमतों को नियंत्रित किये जाने का प्रावधान किया गया है।

संबंधित चिताएं:

  1. इस अध्यादेश के अंतर्गत कृषि उपजों की मूल्य सीमा में उतार-चढ़ाव काफी विषम है (बागवानी उपजों की खुदरा कीमतों में 100% की वृद्धि तथा शीघ्र ख़राब नहीं होने वाले कृषि खाद्य पदार्थों कीखुदरा कीमतों में 50% की वृद्धि)।
  2. इसके तहत किसी कृषि उपज के मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) प्रतिभागी की स्थापित क्षमता स्टॉक सीमा लगाए जाने से मुक्त रहेगी।
  3. निर्यातक, वस्तुओं की मांग दिखाने पर, स्टॉक सीमा लगाए जाने से मुक्त रहेंगे।

कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020:

मुख्य प्रावधान: इसके तहत, कृषि उपज बाज़ार समिति (Agricultural Produce Market Committees-APMC) बाजारों की उपेक्षा करते हुए निजी स्थल पर अथवा APMC द्वारा निर्धारित बाजार-स्थलों के बाहर व्यापार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है।

संबंधित चिताएं:

  1. इस अध्यादेश से इस प्रकार की स्थिति निर्मित हो जाती है, जिसमे किसानों को स्थानीय बाजार में अपनी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर बेचने से कोई खरीददार नहीं मिलता है।
  2. चूंकि, अधिकांश किसान छोटे अथवा सीमांत कृषि-भूमि के मालिक होते हैं, और इनके पास अपनी उपज को दूर की बाजारों में बेचने हेतु परिवहन के लिए साधन नहीं होते है।
  3. अतः, इन किसानों को अपनी उपज स्थानीय बाजार में ही न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमतों पर कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

मूल्य आश्वासन पर किसान समझौता (अधिकार प्रदान करना और सुरक्षा) और कृषि सेवा अध्यादेश 2020:

मुख्य प्रावधान: इसके अंतर्गत भारत में अनुबंध कृषि (Contract Farming) के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार किये जाने का प्रावधान किया गया है।

इसके साथ दो वृहत् चिंताएं जुड़ी हैं:

  1. पहली चिंता का कारण अनुबंध कृषि में किसानों तथा कार्पोरेट्स के मध्य समझौता करने की शक्ति से संबंधित है। इसमें एक किसान अपनी पैदावार के लिय उचित मूल्य तय करने में कॉर्पोरेट अथवा बड़े व्यवसायिक प्रायोजकों के साथ समझौता करने में पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं होता है।
  2. दूसरे, अध्यादेश में कहा गया है, कि गुणवत्ता मानकों को समझौते में दोनों पक्षों द्वारा पारस्परिक रूप से तय किया जा सकता है। लेकिन, कॉरपोरेट्स के द्वारा उपज की गुणवत्ता के संदर्भ में एकरूपता मामलों को शामिल करने पर, गुणवत्ता पहलू काफी महत्वपूर्ण हो जाएगा, क्योंकि, देश में कृषि-पारिस्थितिक विविधता में असमानता होने कारण गुणवत्ता में एकरूपता संभव नहीं होगी।

निष्कर्ष:

यह तीनों अध्यादेश, संबंधित राज्यों पर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संदर्भों के आधार पर दूरगामी और अलग-अलग प्रभाव डालेंगे।

  1. केंद्र के द्वारा इस प्रकार के साहसिक और एकतरफा कदम, विभिन्न राज्यों के अन्दर भूमि विविधता, फसलों के पैटर्न, कृषि बाजारों के ऐतिहासिक कामकाज आदि, तथा देश की विशाल विविधता को समाहित करने में विफल रहे हैं।
  2. इसलिए, आशंका यह है कि यह तीनों अध्यादेश किसानों की मदद करने के बजाय देश में लाखों छोटे और सीमांत किसानों के लिए संकट का कारण बन सकते हैं। इस प्रकार के उदाहरण, पिछले विमुद्रीकरण (demonetization) तथा COVID-19 के कारण अनियोजित लॉकडाउन संबंधित मामलों में देखे जा सकते हैं

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम

(National Cooperative Development Corporation- NCDC)

G.S. Paper-II (National)

संदर्भ:

हाल ही में, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (National Cooperative Development Corporation – NCDC) द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) कार्यक्रम के तहत खरीफ फसलों में धान की खरीद के लिए छत्तीसगढ़, हरियाणा और तेलंगाना राज्यों को 19444 करोड़ रुपये की राशि को पहली किस्त के रूप में मंजूरी दे दी गयी है।

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम के बारे में:

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC), राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1962 के तहत स्थापित एक सांविधिक निगम है।

  1. NCDC का उद्देश्यकृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, औद्योगिक वस्तुओं, पशुधन और कुछ अन्य अधिसूचित वस्तुओं और सेवाओं के सहकारी सिद्धांतों पर उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन, भंडारण, निर्यात और आयात के कार्यक्रमों की योजना बनाना तथा इनको प्रोत्साहित करना है।
  2. NCDC सहकारी समितियों के लिए एक प्रमुख वित्तीय संस्थान है।
  3. इसके द्वारा एकमिशन सहकार 22 का आरम्भ किया गया है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करना है।

वित्त विधेयक

(Finance Bill)

G.S. Paper-II (National)

बजट को दो भागों में सदन के सामने रखा जाता है, जिसमें पहला भाग वित्त विधेयक (फाइनेंस बिल) और दूसरा विनियोग विधेयक (अप्रोप्रीएशन बिल) होता है. जहां वित्त विधेयक सरकार की आय पक्ष को दर्शाता है. वहीं विनियोग विधेयक विभिन्न मंत्रालयों की ओर से मांगे गए अनुदानों और प्रभारित व्यय को दर्शाता है.

वित्त विधेयक क्या है?

  • आने वाले वर्ष के लिए सरकार के सब वित्तीय प्रस्ताव एक विधेयक में सम्मिलित किए जाते हैं जिसे वित्त विधेयक कहा जाता है.
  • यह विधेयक साधारणतया, प्रत्येक वर्ष बजट पेश किए जाने के तुरंत बाद लोकसभा में पेश किया जाता हे.
  • यह सरकार के वित्तीय प्रस्तावों को और किसी अवधि के लिए अनुपूरक वित्तीय प्रस्तावों को भी प्रभावी करता है.

वित्त विधेयक पेश करने की अनुमति-

वित्त विधेयक को पेश करने की अनुमति के लिए रखे गए प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जा सकता और उसे तुरंत मतदान के लिए रखा जाता है.

वित्त विधेयक पर चर्चा की सीमाएं क्या हैं?

  • विधेयक पर चर्चा सामान्य प्रशासन और स्थानीय शिकायतों के संबंधी मामलों पर होती है, जिनके लिए संघ सरकार उत्तरदायी हो.
  • सरकार की नीति की सामान्य रूप से आलोचना करने की अनुमति तो है, परंतु किसी विशेष अनुमान के ब्यौरों पर चर्चा नहीं की जा सकती.
  • संक्षेप में, समूचे प्रशासन का पुनरीक्षण तो होता है, लेकिन जिन प्रश्नों पर चर्चा हो चुकी हो उन पर फिर से चर्चा नहीं की जा सकती.

वित्तविधेयक पारित होने और राष्ट्रपति की अनुमति के लिए समयसीमा क्या होती है?

यह विधेयक पेश किए जाने के बाद 75 दिनों के भीतर संसद द्वारा इस पर विचार करके पास किया जाना और उस पर राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो जाना आवश्यक है.

वित्त विधेयक की क्या विशिष्टता होती है?

सामान्य रूप से, कोई ऐसा विधेयक वित्त विधेयक होता है, जो राजस्व या व्यय से संबंधित हो. वित्त विधेयकों में किसी धन विधेयक के लिए उल्लिखित किसी मामले का उपबंध शामिल होने के अलावा अन्य राजस्व या व्यय संबधी मामलों का भी उल्लेख किया जाता है.

वित्त विधेयक कितने प्रकार के होते हैं?

वित्त विधेयकों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है-

श्रेणी : ऐसे विधेयक जिनमें धन विधेयक के लिए अनुच्छेद 110 में उल्लिखित किसी भी मामले के लिए उपबंध किए जाते हैं. हालांकि इसमें अन्य प्रकार के मामले भी होते हैं. उदाहरणार्थ किसी विधेयक में करारोपण का खंड हो, परंतु वह केवल करारोपण के संबंध में न हो, उसमें अन्य वित्तीय मामले भी हों.

श्रेणी : ऐसे वित्तीय विधेयक जिनमें संचित निधि से व्यय संबंधी उपबंध किए गए हो.

धन विधेयक और वित्त विधेयक में अंतर

धन विधेयक और वित्त विधेयकों को पास कराने की प्रक्रिया में अंतर होता है. धन विधेयक, राष्ट्रपति की सिफारिश पर केवल लोकसभा में पेश किया जाता है, और राज्यसभा को उस पर अपनी सम्मति देने या रोकने की शक्ति प्राप्त नहीं है. इसके विपरीत वित्त विधेयक के संबंध में राज्यसभा को सम्मति देने, संशोधन करने या रोकने की पूरी शक्ति प्राप्त है. जैसे कि साधारण विधेयक के विषय में होती है.

प्री के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

‘भारत में स्वास्थ्य’ सर्वेक्षण

(‘Health in India’ survey)

हेल्थ इन इंडिया सर्वे रिपोर्ट, हाल ही में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी की गयी है।

प्रमुख निष्कर्ष:

  1. रिपोर्ट के अनुसार, पारसी समुदाय बीमारियों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील है।
  2. सर्वेक्षण में, बीमारी को, किसी व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में किसी भी विचलन के रूप में परिभाषित किया गया है।
  3. जुलाई में जारी की गयी ‘राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण’ (National Sample Survey- NSS) के अनुसार, तत्कालीन सर्वेक्षण के दौरान 1 फीसदी पारसी समुदाय के व्यक्ति बीमारी से ग्रस्त थे।

 

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