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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति

G.S. Paper-II

संदर्भ:

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति व्यक्त की है, कि ‘उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों को निपटाने हेतु तदर्थ आधार पर सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को नियुक्त करने की योजना’, नियमित न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को रोकने या इसे आगे बढ़ाने का बहाना नहीं बनना चाहिए।

आवश्यकता:

उच्च न्यायालयों में, 1 अप्रैल को, नियमित न्यायाधीशों के 411 पद रिक्त थे, जबकि न्यायाधीशों के कुल स्वीकृत पदों की संख्या 1,080 है। वर्तमान में, उच्च न्यायालयों में कुल 669 न्यायाधीशों कार्यरत हैं।

अदालत द्वारा की गयी टिप्पणी:

उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को, संबंधित उच्च न्यायालयों में न्यायिक रिक्तियों को भरने में उनके प्रयासों के समक्ष विशेष अवरोध आने की स्थिति में ही ‘तदर्थ न्यायाधीशों’ (Ad Hoc Judges) की नियुक्ति करनी चाहिए, भले ही उनकी अदालत में लंबित मामलों की संख्या ‘लाल रेखा’ पार कर गयी हो। नियमित सिफारिशों के स्थान पर, तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं की जानी चाहिए।

समय की मांग:

एक ऐसी प्रक्रिया लागू की जानी चाहिए जिसमे, मुख्य न्यायाधीश द्वारा ‘तदर्थ न्यायाधीश’ की नियुक्ति-प्रक्रिया कब शुरू की जानी चाहिए; इस प्रकार की नियुक्तियों के लिए लंबित मामलों की सीमा-रेखा; तदर्थ न्यायाधीशों का कार्यकाल एवं भत्ते आदि विवरण दिया गया हो।

इस संबंध में संवैधानिक प्रावधान:

अनुच्छेद 224A के अंतर्गत तहत संविधान में तदर्थ न्यायाधीशों (ad-hoc judges) की नियुक्ति संबंधी प्रावधान किये गए हैं।

अपनाई जाने वाली प्रक्रिया:

  1. उपरोक्त अनुच्छेद के तहत, किसी राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश किसी भी समय, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उसी उच्च न्यायालय अथवा किसी अन्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुके किसी व्यक्ति से राज्य के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है।
  2. इस प्रकार नियुक्त किये गए न्यायाधीश को राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित भत्ते प्रदान किये जाएंगे। उसके लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के सभी आधिकारिता, शक्तियां और विशेषाधिकार प्राप्त होंगे, किंतु उसके लिए उस उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नहीं माना जाएगा।

प्री के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

ज्ञानवापी मस्जिद

(Gyanvapi Mosque)

वाराणसी की एक स्थानीय अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ का एक सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया है। इससे यह पता लगाया जाएगा कि, मौजूदा इमारत किसी प्रकार का ‘आरोपण’, ‘परिवर्तन’ या ‘परिवर्धन’ है अथवा किसी भी अन्य धार्मिक इमारत की संरचनात्मक अतिव्याप्ति है।

संबंधित प्रकरण:

अदालत ने यह यह आदेश एक याचिका के आधार पर जारी किया है, जिसमे, जिस भूमि पर ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ बनी हुई है, उसे हिन्दुओं को वापस सौपने की मांग की गई है। याचिका में दावा किस्या गया है, कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने मस्जिद बनाने के लिए पुराने काशी विश्वनाथ मंदिर के कुछ हिस्सों को गिरा दिया था

 

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