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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

जैव-अपघटक तकनीक

6th November, 2020

G.S. Paper-III

संदर्भ:

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अनुसार, फसल-अपशिष्ट / पराली को खाद में परिवर्तित करने वाली जैवअपघटक तकनीक (Bio-decomposer technique) ने सफलता दिखाई है।

मुख्यमंत्री केजरीवाल का यह दावा एक खेत में दिल्ली सरकार द्वारा इस तकनीक के प्रयोग से प्राप्त प्रारंभिक परिणामों पर आधारित था। तकनीक में प्रयुक्त जैवअपघटक घोल को पूसा (PUSA) इंस्टिट्यूट के निर्देशन में विकसित किया गया था।

निहितार्थ-

  1. दिल्ली सरकार, कम लागत और प्रभावकारी जैव-अपघटक तकनीक को प्रदूषण से निपटने के लिए एक विकल्प के रूप में उच्चतम न्यायालय में पेश करेगी।
  2. इस तकनीक को पंजाब और हरियाणा में भी किसानों द्वारा उपयोग किया जा सकता है।

जैव-अपघटक का निर्माण-

इस तकनीक में प्रयुक्त जैव-अपघटक घोल को पूसा डीकंपोजर (Pusa Decomposer) भी कहा जा रहा है।

  • पूसा डीकंपोजरसात कवकों का एक मिश्रण होता है जो पराली (Paddy Straw) में पाए जाने वाले सेल्युलोज, लिग्निन और पेक्टिन को गलाने वाले एंजाइम का उत्पादन करता है।
  • यह कवक 30-32 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले वातावरण विकसित होते है, और धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के समय यही तापमान होता है।

पूसा डीकंपोजर का खेतों में उपयोग किस प्रकार किया जाता है?

पूसा डीकंपोज़र कैप्सूल (Decomposer Capsules) का उपयोग करके एक ‘अपघटक घोल’ बनाया जाता है।

  1. अपघटक घोल को 8-10 दिन किण्वित (fermenting) करने के पश्चात तैयार मिश्रण का फसल अपशिष्ट/पराली के शीघ्र जैव-अपघटन के लिए खेतों में छिड़काव किया जाता है।
  2. किसान, चार पूसा डीकंपोज़र कैप्सूल, गुड़ और चने के आटे से 25 लीटर अपघटक घोल मिश्रण को तैयार कर सकते हैं, और यह 1 हेक्टेयर भूमि पर छिड़काव करने के लिए पर्याप्त होता है।
  3. जैव अपघटन की प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग 20 दिनों का समय लगता है। इसके बाद किसान पराली को जलाए बिना फिर से बुवाई कर सकते हैं।

पूसा डीकंपोजर के लाभ:

  1. इस तकनीक के प्रयोग से मृदा की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार होता है क्योंकि पराली फसलों के लिए उर्वरक का काम करती है और भविष्य में कम खाद लगाने की आवश्यकता होती है।
  2. यह फसल-अपशिष्ट / पराली को जलाने से रोकने हेतु एक प्रभावी, सस्ती और व्यावहारिक तकनीक है।
  3. यह पर्यावरण के अनुकूल और पर्यावरण की दृष्टि से उपयोगी तकनीक भी है।

पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के बाहर

G.S. Paper-II

संदर्भ:

हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका, औपचारिक रूप से, जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण करने संबंधी पेरिस समझौते से अलग हो गया है।

वर्तमान में वर्ष 2015 के पेरिस समझौते में 189 सदस्य हैं।

पेरिस समझौता-

यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये एक ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, तथा यह वैश्विक ग्रीनहाउस उत्सर्जन को कम करने हेतु एक समान लक्ष्य निर्धारित करने के लिए लगभग 200 देशों को एक साथ लाता है।

  1. इस समझौते में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के जरिये वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के अंदर सीमित रखने और तापमान वृद्धि को और5 डिग्री सेल्सियस रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
  2. इन उद्देश्यों को पूरा करने हेतु, प्रत्येक देश ने उनके ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीमित करने वाली लक्षित कार्य योजनाओं को लागू करने का संकल्प लिया है।
  3. इस समझौते में जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा अनुकूलन करने के प्रयास में, समृद्ध और विकसित देशों से, विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए कहा गया है।

कोई देश समझौते से किस प्रकार अलग हो सकता है?

  1. पेरिस समझौते का अनुच्छेद 28 के तहत किसी सदस्य राष्ट्र के लिए पेरिस समझौते से अलग होने संबंधी प्रावधान किये गए हैं।
  2. किसी सदस्य- राष्ट्र द्वारा पेरिस समझौते के लागू होने के न्यूनतम तीन साल बाद ही समझौते से अलग होने का नोटिस दिया जा सकता है।

प्री के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

लीशमैनिया डोनोवानी

लीशमैनिया डोनोवानी (कालाजार रोग परजीवी), के रोगजनन क्षमता एवं उसके अस्तित्व की रणनीति को समझने की दिशा में किए गए उनके महत्वपूर्ण शोध कार्य के लिए CSIR-CDRI लखनऊ के वैज्ञानिक को इस साल के प्रोफेसर ए.एन. भादुड़ी मेमोरियल लेक्चर अवार्ड के लिए चुना गया है।

  1. लीशमैनिया डोनोवानी एक प्रोटोजोअन परजीवी है जो मैक्रोफेजकोशिकाओं को संक्रमित करता है और दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करने वाले एक घातक संक्रामक रोग,लीश्मेनीयासिस (कालाजार) का मुख्य कारक है।
  2. यह प्लीहा, यकृत और अस्थि मज्जा सहित मोनोन्यूक्लियर फैगोसाइट सिस्टम को संक्रमित करता है।

 

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