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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

कोहला जलविद्युत् परियोजना

3rd July, 2020

(G.S. Paper-II)

  • यह जलवविद्युत् परियोजना PoK में बहने वाली झेलम नदी के ऊपर बनाई जायेगी.
  • इस परियोजना का उद्देश्य पाकिस्तान के लोगों को पांच अरब से ज्यादा साफ और कम लागत वाली बिजली की यूनिट उपलब्ध करानी है.
  • पाकिस्तान में स्वतंत्र पावर प्रोड्यूसर के रूप में होने वाला यह अब तक का सबसे बड़ा निवेश है.

दियामर बाशा परियोजना क्या है?

  • 2010 से पाकिस्तान POK के गिलगित-बाल्टिस्तान में सिंधु नदी पर दियामर बाशा बांध बनाने की कोशिश कर रहा है लेकिन आर्थिक तंगी के कारण यह संभव हो नहीं पा रहा था. कुछ समय           पहले पाकिस्तानी सेना की कमर्शियल विंग ने इस बांध के निर्माण हेतु CPEC के अंतर्गत चीनी         कंपनी चाइना पावर के साथ समझौता किया है जिसके कारण इस परियोजना में तेजी आने की      संभावना बढ़ गई है.

CPEC-

  • CPEC चीन के One Belt One Road (OBOR) कार्यक्रम का एक अंग है.
  • CPEC 51 अरब डॉलर की कई परियोजनाओं का समूह है.
  • प्रस्तावित परियोजना के लिए पाकिस्तान सरकार को जिन संस्थाओं द्वारा धन मुहैया कराया जाएगा, वे हैं – EXIM बैंक ऑफ़ चाइना, चाइना डेवलपमेंट बैंक और इंडस्ट्रियल & कमर्शियल बैंक        ऑफ़ चाइना.
  • चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का उद्देश्य पाकिस्तान के बुनियादी ढांचों को तेजी से विस्तार करना और उन्नत करना है जिससे चीन और पाकिस्तान के बीच आर्थिक संबंध मजबूत हो जाएँ.
  • CPEC अंततोगत्वा दक्षिणी-पश्चिमी पाकिस्तान के ग्वादर शहर को चीन के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र Xinjiang को राजमार्गों और रेलमार्गों से जोड़ेगा.
  • CPEC की लम्बाई 3,000 km है जिसमें राजमार्ग, रेलवे और पाइपलाइन बिछेगी.

 

क्या है OBOR परियोजना?

यह चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना है जो 2013 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा शुरू की गई थी. इसे ‘सिल्क रोड इकॉनमिक बेल्ट’ और 21वीं सदी के ‘समुद्री सिल्क रोड’ के रूप में भी जाना जाता है। यह एक विकास रणनीति है जो कनेक्टिविटी पर केंद्रित है. इसके माध्यम से सड़कों, रेल, बंदरगाह, पाइपलाइनों और अन्य बुनियादी सुविधाओं को ज़मीन और समुद्र होते हुए एशिया, यूरोप और अफ्रीका से जोड़ने का विचार है. इसका एक उद्देश्य यह भी है कि इसके द्वारा चीन अपना वैश्विक स्तर पर प्रभुत्व बनाना चाहता है.

क्या भारत के लिए यह चिंता की बात है?

गलियारा का हिस्सा PoK से होकर गुजरेगा जिसे भारत अपना अभिन्न अंग मानता है. भारत का कहना है कि यह गलियारा उसकी क्षेत्रीय अखंडता को आहत करता है. CPEC के कारण हिन्द महासागर में चीन का दबदबा बढ़ सकता है जिससे भारतीय हितों को क्षति पहुँच सकती है. अगर हम चीन द्वारा संचालित नीतियों जैसे स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स, BCIM (बांग्लादेश-चीन-म्यांमार-भारत) कारीडोर और CPEC को समन्वित रूप से देखें तो चीन चारों ओर से भारत को घेर लेगा जो कि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

गोधन न्याय योजना

(G.S. Paper-II)

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पशुपालन को व्यावसायिक रूप से लाभदायक बनाने, मवेशियों द्वारा खुले में चराई को रोकने, सड़कों पर आवारा पशुओं की समस्या को हल करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए राज्य में गोधन न्याय योजना शुरू करने की घोषणा की है.

पृष्ठभूमि-

  • भारत के सभी राज्यों समेत छत्तीसगढ़ में खुले में पशुओं के चरने की परंपरा रही है, जो मवेशियों और फसलों दोनों को ही क्षति पहुँचाती है.
  • शहरों की सड़कों पर आवारा जानवरों के चलते सड़क दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती हैं.
  • प्रायः जानवरों से दूध निकालने के पश्चात् उन्हें खुले में छोड़ दिया जाता है, जो अन्य विभिन्न समस्याओं का कारण बनता है.

गोधन न्याय योजना के विषय में-

  • गोधन न्याय योजना के अंतर्गत पशु पालकों को लाभ पहुँचाने के राज्य सरकार किसानों से गाय का गोबर खरीदेगी. गौ-पालन को आर्थिक रूप से लाभदायी बनाने तथा खुले में चराई की रोकथाम      के लिए किसानों से गाय का गोबर खरीद कर उससे वर्मी कंपोस्ट खाद बनाएगी. इसके बाद प्राप्त         वर्मी कंपोस्ट खाद को बाद में किसानों, वन विभाग और उद्यानिकी विभाग को प्रदान किया जाएगा.
  • गोधन न्याय योजना का प्रारम्भ 21 जुलाई को हरेली त्योहार के दिन होगा. विदित हो कि छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य होगा जो गोबर की खरीद करेगा.
  • इस योजना के अंतर्गत गोबर की खरीदी निर्धारित दर पर होगी वहीं सहकारी समितियों से वर्मी कम्पोस्ट की‍ बिक्री होगी. गोबर के क्रय की दर तय करने हेतु पाँच सदस्यीय मंत्री मण्डल की उप-       समिति का गठन किया गया.

गोधन न्याय योजना के लाभ-

  • गोधन न्याय योजना से गांवों में रोजगार और अतिरिक्त आय के अवसर में वृद्धि होगी.
  • इस योजना से जैविक कृषि को प्रोत्साहन मिलेगा.
  • पशुओं के अतिचारण से मृदा का संरक्षण किया जाना संभव हो पायेगा.
  • इससे न केवल सड़क दुर्घटनाओं पर नियंत्रण लगाया जा सकेगा बल्कि इससे जुड़े अन्य विभिन्न समस्याओं को भी कम किया जा सकेगा.

विवादित क्षेत्र: गलवान घाटी

(G.S. Paper-II)

चर्चा में क्यों?

हाल ही में गलवान घाटी (Galwan Valley) भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हो गई, जिसमें दोनों पक्षों को भारी जान-माल के नुकसान का सामना करना पड़ा। ध्यातव्य है कि गलवान घाटी वर्ष 1962 से ही दोनों देशों के बीच तनाव का एक विषय बना हुआ है।

प्रमुख बिंदु

  • चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने एक बयान में दावा किया है कि संपूर्ण गलवान घाटी ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (Line of Actual Control-LAC) के चीनी पक्ष पर स्थित है और इसलिये यह चीन         का हिस्सा है।
  • वहीं भारत ने चीन के इस दावे को ‘अतिरंजित और असमर्थनीय’ बताया है।

कहाँ है गलवान घाटी?

  • गलवान घाटी सामान्यतः उस भूमि को संदर्भित करती है, जो गलवान नदी (Galwan River) के पास मौजूद पहाड़ियों के बीच स्थित है।
  • गलवान नदी का स्रोत चीन की ओर अक्साई चीन में मौजूद है और आगे चल कर यह भारत की          श्योक नदी (Shyok River) से मिलती है।
  • ध्यातव्य है कि यह घाटी पश्चिम में लद्दाख और पूर्व में अक्साई चीन के बीच स्थित है, जिसके कारण यह रणनीतिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण है।
  • इसका पूर्वी हिस्सा चीन के झिंजियांग तिब्बत मार्ग (Xinjiang Tibet Road) से काफी नज़दीक है, जिसे G219 राजमार्ग (G219 Highway) कहा जाता है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC)-

  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) एक प्रकार की सीमांकन रेखा है, जो भारतीय-नियंत्रित क्षेत्र और चीनी-नियंत्रित क्षेत्र को एक दूसरे से अलग करती है।
  • जहाँ एक ओर भारत मानता है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की लंबाई लगभग 3,440  किलोमीटर है, वहीं चीन इस रेखा को तकरीबन 2,000 किलोमीटर लंबा मानता है।

चीन का दावा

  • ध्यातव्य है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) गलवान घाटी और श्योक नदियों के संगम के पूर्व में स्थित है, जिस पर भारत और चीन दोनों हाल के वर्षों में पेट्रोलिंग (Patrolling) कर रहे हैं।
  • 15 जून 2020 को हुई हिंसक झड़प के बाद चीन ने दावा किया है कि संपूर्ण गलवान घाटी चीन के नियंत्रण क्षेत्र में आती है।
  • गौरतलब है कि बीते महीनों से चीन गालवान घाटी और श्योक नदी के संगम तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के बीच के क्षेत्र में भारत की सड़क निर्माण गतिविधियों पर आपत्ति जता            रहा है। भारत ने चीन के दावे को सिरे से खारिज़ कर दिया है।
    • चीन के लगभग सभी मानचित्रों में संपूर्ण गलवान घाटी को चीन के नियंत्रण वाले क्षेत्र का हिस्सा दिखा जाता है।

मानचित्र के आधार पर क्षेत्र का निर्धारण

  • विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के मानचित्र के आधार पर इस विवाद को सुलझाना काफी जटिल कार्य है, जानकारों के अनुसार 1956 का मानचित्र दोनों देशों के बीच सीमा का एकदम सही        निर्धारण करता है।
  • ध्यातव्य है कि वर्ष 1956 का मानचित्र संपूर्ण गलवान घाटी को भारत के एक हिस्से के रूप में प्रदर्शित करता है, हालाँकि जून 1960 में चीन ने गलवान घाटी पर अपनी संप्रभुता का दावा करते     हुए एक नया मानचित्र प्रस्तुत प्रस्तुत किया, जिसमें गलवान घाटी को चीन के हिस्से के रूप में            दिखाया गया था।
  • इसके पश्चात् नवंबर 1962 में भी एक नया मानचित्र जिसमें संपूर्ण गलवान घाटी पर दावा प्रस्तुत किया गया, किंतु इसके बाद चीन की सरकार द्वारा जारी किये गए नक्शों में गलवान नदी के         पश्चिमी सिरे को चीन के हिस्से के रूप में नहीं दिखाया गया।

प्री के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

ग्लोब्बा एंडरसोनी

लगभग 136 वर्षों के अंतराल के बाद पुणे एवं केरल के शोधकर्त्ताओं की टीम ने तीस्ता नदी घाटी क्षेत्र के पास सिक्किम हिमालय में ग्लोब्बा एंडरसोनी (Globba Andersonii) नामक एक दुर्लभ व गंभीर रूप से लुप्तप्राय पौधे की प्रजाति को पुनः खोजा है।

प्रमुख बिंदु:

  • इस पौधे को आमतौर पर ‘डांसिंग लेडीज़’ (Dancing Ladies)’ या ‘स्वान फ्लावर्स’ (Swan Flowers) के रूप में जाना जाता है।
  • इस पौधे को इससे पहले वर्ष 1875 में देखा गया था। इसके बाद इसे विलुप्त मान लिया गया था।
  • इस प्रजाति के संग्रह के शुरुआती रिकॉर्ड वर्ष 1862-70 की अवधि के बीच के थे जब इसे स्कॉटिश वनस्पतिशास्त्री थॉमस एंडरसन (Thomas Anderson) ने सिक्किम एवं दार्जिलिंग से एकत्र किया       था। इसके बाद वर्ष 1875 में ब्रिटिश वनस्पतिशास्त्री सर जॉर्ज किंग (Sir George King) ने    सिक्किम हिमालय से इसे एकत्र किया था।

ग्लोब्बा एंडरसोनी (Globba Andersonii) की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:

  • सफेद फूल
  • गैर-अनुबंध परागकोष (एक पुंकेसर का भाग जिसमें पराग होता है)
  • पीला अधर
  • इस प्रजाति को ‘गंभीर रूप से लुप्तप्राय’ (Critically Endangered) और ‘संकीर्ण रूप से स्थानिक’ (Narrowly Endemic) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • यह प्रजाति मुख्य रूप से तीस्ता नदी घाटी (Teesta River Valley) क्षेत्र तक ही सीमित है जिसमें सिक्किम हिमालय एवं दार्जिलिंग पर्वत श्रृंखला शामिल हैं।
  • यह पौधा आमतौर पर सदाबहार वनों के उपांत में चट्टानी ढलानों पर लिथोफाइट (चट्टान या पत्थर पर उगने वाला पौधा) के रूप में घने क्षेत्रों में उगता है।

जी4 वायरस

चीन में वैज्ञानिकों द्वारा एक नए वायरस जी4 (G4) की खोज की गई है जो वर्ष 2009 के स्वाइन फ्लू से काफी मिलता-जुलता है।

प्रमुख बिंदु:

  • इस जी4 वायरस का पूरा नामजी4 ईए एच1 एन(G4 EA H1N1) है। इसमें मनुष्यों में महामारी      फैलाने की क्षमता है।
  • चीन में सुअरों के लिये निगरानी कार्यक्रम के दौरान वहाँ के नेशनल इन्फ्लुएंज़ा सेंटर (National Influenza Centre) सहित कई संस्थानों में वैज्ञानिकों द्वारा G4 वायरस का पता लगाया गया था।
  • यह निगरानी कार्यक्रम वर्ष 2011-18 के बीच चीन के 10 प्रांतों में सूअरों के 30,000 से अधिक स्वाब (Swab) नमूनों को एकत्र करके शुरू किया गया था।
  • इन नमूनों में से शोधकर्त्ताओं ने 179स्वाइन फ्लू वायरस को अलग किया था जिनमें से अधिकांश     नए पहचाने गए जी4 वायरस के थे।
    • परीक्षणों में पाया गया कि यह वायरस ज़ूनोटिक संक्रमण (पशु से मानव में) उत्पन्न कर सकता है किंतु अभी तक वायरस के व्यक्ति-से-व्यक्ति में संचरण के कोई सबूत नहीं हैं।

वैज्ञानिकों का मानना हैं कि नया G4 वायरस, H1N1 वायरस का ही एक परंपरागत रूप है जो वर्ष   2009 की स्वाइन फ्लू महामारी के लिये ज़िम्मेदार था।

 

 

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