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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

कोरोनावायरस

समाचार में क्यों?    

हाल ही में कोरोनावायरस (Coronavirus) के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार के जोखिम को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation- WHO) ने ‘अंतर्राष्ट्रीय चिंता संबंधी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (Public Health Emergency of International Concern- PHEIC) लागू करने की घोषणा की है।

मुख्य बिंदु:

  • WHO के अनुसार, यह वायरस कमज़ोर स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली वाले देशों में सर्वाधिक प्रभावी हो सकता है।
  • WHO के अनुसार, जर्मनी, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और वियतनाम सहित 18 अन्य देशों में कोरोनावायरस संक्रमण के 82 मामलों की पुष्टि की गई है।

अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने के कारण:

  • चीन से प्रसारित कोरोनावायरस दुनिया के कई देशों में दस्तक दे रहा है, अकेले चीन में ही इस वायरस से मरने वाले लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढती जा रही है।
  • चीन में 7,700 से अधिक व्यक्ति इस वायरस से संक्रमित हुए हैं जिनमें से लगभग 170 व्यक्तियों की मौत हो चुकी है।
  • पूरे विश्व में कोरोनावायरस से संक्रमित लगभग 8,200 से अधिक मरीज़ हैं, जिसे देखते हुए कोरोनावायरस को अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया जाना चाहिये।

अन्य वायरस जिनके संबंध में लागू हुआ अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल:

  • WHO ने वर्ष 2007 में अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल से संबंधित कानून के प्रभावी होने के बाद से पाँच बार सार्वजनिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल लागू किया है।
  • इससे पहले स्वाइन फ्लू (Swine Flu), पोलियो (Polio), ज़ीका (Zika) के संबंध में एक-एक बार तथा इबोला (Ebola) के संक्रमण के संबंध में दो बार आपातकाल लगाया जा चुका है।

क्या है अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल?

  • कुछ गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य घटनाएँ जिनसे अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा उत्पन्न होता है और ऐसी आपात स्थितियों के नियमन के लिये WHO द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल लागू किया जाता है।
  • WHO अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल के लिये ‘अंतर्राष्ट्रीय चिंता संबंधी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (Public Health Emergencies of International Concern- PHEIC) नामक पद का प्रयोग करता है।
  • PHEIC को अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियमन, 2005 (International Health Regulations- IHR)में एक असाधारण घटना के रूप में परिभाषित किया गया है जो निम्नलिखित स्थितियों पर विनियमों के उद्देश्य से लगाया जाता है-
  • रोग के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार से अन्य देशों के लिये एक सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होना।
  • ऐसी स्थिति जो कि गंभीर, असामान्य या अप्रत्याशित हो तथा जिसका संक्रमण प्रभावित राज्य की राष्ट्रीय सीमा से परे हो और जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये खतरा उत्पन्न कर दिया हो तथा ऐसी स्थिति के लिये तत्काल अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता हो।

कैसे होता है आपात स्थिति का निर्धारण?

  • आपात स्थिति निर्धारित करने की ज़िम्मेदारी WHO महानिदेशक की होती है, ऐसी स्थिति के निर्धारण के लिये विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया जाता है जिसे ‘IHR इमरजेंसी कमेटी (IHR Emergency Committee) के नाम से जाना जाता है।
  • यह समिति WHO के महानिदेशक को आपातकाल लागू करने के मापदंडों पर सलाह देती है, जिन्हें अस्थायी सिफारिशों के रूप में जाना जाता है।
  • इन अस्थायी सिफारिशों में PHEIC की स्थिति वाले देशों द्वारा प्रयोग में लाए गए स्वास्थ्य देखभाल उपाय भी शामिल किये जाते हैं।
  • इस समिति की सिफारशों के आधार पर WHO महानिदेशक द्वारा PHEIC को लागू किया जाता है।

इकोसिस्टम-आधारित अनुकूलन (2020-2024)

समाचार में क्यों?    

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UN Environment Programme-UNEP) और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (International Union for Conservation of Nature-IUCN) इकोसिस्टम-आधारित अनुकूलन (2020-2024) के लिये संयुक्त रूप से ग्लोबल फंड (Global Fund for Ecosystem-based Adaptation) लॉन्च कर रहे हैं।

उद्देश्य :

  • इस फंड का उद्देश्य अभिनव दृष्टिकोण के साथ पारिस्थितिकी तंत्र आधारित अनुकूलन के लिये लक्षित और तीव्र समर्थन तंत्र प्रदान करना है।

प्रमुख बिंदु :

  • हाल ही में मैड्रिड में संपन्न संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP 25) में जर्मनी के संघीय पर्यावरण मंत्रालय ने घोषणा की कि यह नए UNEP-IUCN कार्यक्रम के लिये 20 मिलियन यूरो प्रदान करेगा।
  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत संबंधित गैर-सरकारी संगठनों और INGOs के साथ मिलकर काम करने पर विशेष बल दिया जाएगा, साथ ही इसमें तकनीकी ज्ञान और समझ में विशिष्ट अंतराल को ध्यान में रखते हुए सरकारों के साथ काम करने पर विशेष ध्यान होगा।

EbA क्या है?

  • पारिस्थितिक तंत्र-आधारित अनुकूलन (Ecosystem-based adaptation-EbA) ऐसे दृष्टिकोणों के समूह को संदर्भित करता है जो मानव समुदायों की जलवायु परिवर्तन की भेद्यता को कम करने के लिये पारिस्थितिक तंत्र के प्रबंधन को शामिल करते हैं।
  • उदाहरण के लिये, मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों की पुनर्स्थापना तटीय क्षेत्रों को बढ़ते समुद्री स्तर के प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करती है, जबकि पहाड़ियों और पहाड़ों पर वनस्पतियों को रोपित करने तथा उनकी बहाली करने से इन क्षेत्रों की अत्यधिक वर्षा के दौरान होने वाले कटाव और भूस्खलन से रक्षा होती है।
  • EbA पारिस्थितिक तंत्र-आधारित या प्रकृति-आधारित जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के उपायों को बढ़ावा देने की गतिविधि का एक प्रमुख स्तंभ है, पिछले कुछ वर्षों में व्यापक स्तर पर लोगों और वैज्ञानिकों का ध्यान गया है।
  • हालाँकि यह एक अंतर्राष्ट्रीय जलवायु पहल (International Climate Initiative-IKI) है, तथापि जर्मनी पारिस्थितिकी तंत्र आधारित अनुकूलन के लिये अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को तकरीबन €60 मिलियन तक बढ़ाने का प्रयास कर रहा है, जिसमें नया UNEP-IUCN कार्यक्रम भी शामिल है।
  • प्रकृति अक्सर जलवायु संबंधी कार्रवाई और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिये सबसे बेहतर समाधान उपलब्ध कराती है। जलवायु संबंधी कार्रवाई और प्रकृति संरक्षण के अलावा ऐसी परियोजनाओं के सामाजिक लाभ भी होते हैं; ये जलवायु परिवर्तन के प्रति सुभेद्य विकासशील देशों के लिये भी लाभकारी साबित होती हैं।
  • इसका एक पमुख कारण यह है कि विकासशील देशों के लोग प्रकृति पर बहुत अधिक सीधे निर्भर होते हैं। कृषि और तटीय संरक्षण के संबंध में भी यही तथ्य सामने आता है।

प्रकृति-आधारित समाधान :

  • जैसा कि हम सभी जानते हैं कि पिछले कुछ समय से वैश्विक जलवायु कार्रवाई के अभिन्न अंग के रूप में प्रकृति आधारित समाधानों को तीव्रता से महत्त्व मिल रहा है, ऐसे में इस कार्यक्रम के अंतर्गत इस प्रकार के समाधानों पर विशेष रूप से बल दिया जाना चाहिये।
  • इस नए कार्यक्रम के अंतर्गत पारिस्थितिक तंत्र में निहित सकारात्मक ऊर्जा का उपयोग मानव समाज को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने और आवश्यक कार्यवाही करने में किया जा सकता है।
  • पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन सहित प्रकृति-आधारित समाधान सितंबर 2019 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन के एक केंद्रीय बिंदु थे। इस दिशा में यूनेप भी निरंतर कार्य कर रहा है।
  • इतना ही नहीं वर्ष 2009 में आईयूसीएन ने भी पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन की अवधारणा का प्रारूप तैयार किया था और तब से वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रति समाज में लोचशीलता को बढ़ाने के लिए इसके उपयोग को बढ़ावा दे रहा है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र आधारित सेवाएँ और जैव-विविधता जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सबसे अच्छे सहयोगी उपाय हैं, यदि इन उपायों को बुद्धिमानीपूर्वक इस्तेमाल किया जाता हैं तो ये जलवायु परिवर्तन शमन की दिशा में बहुत लाभकारी साबित हो सकते हैं।
  • UNEP और IUCN अपनी वैश्विक योजनाओं और प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिये EbA उपायों को लागू करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहे हैं। इस कार्यक्रम द्वारा वित्त पोषित उपायों को विशिष्ट विशेषज्ञता और क्षमता-निर्माण द्वारा आवश्यक समर्थन प्रदान किया जाएगा, जबकि अनुकूलन के लिये प्रकृति-आधारित समाधानों हेतु सूचना, ज्ञान और राजनीतिक इच्छाशक्ति को भी सुदृढ़ बनाने का भरपूर प्रयास किया जाएगा।
  • इसके लिये आईयूसीएन और यूनेप अपने व्यापक मौजूदा नेटवर्क, उपकरण और विशेषज्ञता को इस कार्यक्रम के साथ संबद्ध करेंगे, जिसमें फ्रेंड्स ऑफ इकोसिस्टम-आधारित अनुकूलन (Friends of Ecosystem-based Adaptation-FEBA), यह आईयूसीएन द्वारा समर्थित है, और ग्लोबल एडेप्टेशन नेटवर्क (Global Adaptation Network), यूएनईपी द्वारा समर्थित, को शामिल किया गया है।

प्रीलिम्स के लिए तथ्य

फ्रूट ट्रेन :

  • भारत की पहली फ्रूट ट्रेन (Fruit Train) को आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले में ताड़िपत्री (Tadipatri) रेलवे स्टेशन से जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (मुंबई) के लिये रवाना किया गया।
  • फलों की खेप को ईरान भेजा जाएगा।
  • इससे समय और ईंधन दोनों की बचत होगी क्योंकि अब तक 150 ट्रकों द्वारा कंटेनरों को सड़क के माध्यम से 900 किमी. से अधिक दूर जवाहरलाल नेहरू पोर्ट भेजा जाता था, जहाँ इन तापमान-नियंत्रित कंटेनरों को जहाज़ों पर लादा जाता था।

जवाहरलाल नेहरू पोर्ट:

  • नवी मुंबई स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट को पूर्व में न्हावा शेवा बंदरगाह के नाम से जाना जाता था।
  • यह भारत का शीर्ष कंटेनर पोर्ट है जो भारत में सभी प्रमुख पोर्ट्स का 55 प्रतिशत कंटेनर कार्गों संचालित करता है।
  • इसकी शुरुआत 26 मई, 1989 को हुई थी।
  • सरकार ने आंध्र प्रदेश से 30,000 मीट्रिक टन फलों के निर्यात का लक्ष्य तय कर रखा है और स्थानीय किसानों के साथ मिलकर उत्पादकता बढ़ाने, उपज की गुणवत्ता, उपज का रखरखाव और पैकेजिंग तथा किसानों को बाज़ार से जोड़ने के लिये छह प्रमुख कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रही है।
  • इन कंटेनरों से केलों का निर्यात ‘हैप्पी बनानास (Happy Bananas)’ ब्रांड नाम से किया जा रहा है।
  • आंध्र प्रदेश में अनंतपुर के पुटलूर क्षेत्र और कडप्पा ज़िले के पुलिवेंदुला क्षेत्र के किसान कई अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ‘ग्रीन कैवेंडिश केले का निर्यात कर रहे हैं।

कैवेंडिश केला (Cavendish Banana):

  • इसका वैज्ञानिक नाम मूसा एक्युमिनाटा (Musa Acuminata) है।
  • विश्व में कैवेंडिश केलों का उत्पादन सबसे अधिक होता है, घरों में पीले रंग के जो केले आते हैं वे इसी प्रजाति के हैं।
  • कुछ वर्ष पहले पनामा डिज़ीज़ नामक बीमारी ने कैवेंडिश केलों के उत्पादन को प्रभावित किया था।

इस बीमारी की वजह से वर्ष 1950 में बिग माइक नामक केलों की प्रजाति विलुप्त हो चुकी है। यह बीमारी पेड़ की जड़ों में हमला करती है।

 

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