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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

अवर फ्यूचर ऑन अर्थ-2020

समाचार में क्यों?

  • हाल ही में ‘फ्यूचर अर्थ (Future Earth) नेटवर्क के दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय कार्यालय, भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science-IISC) के ‘दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज द्वारा ‘अवर फ्यूचर ऑन अर्थ-2020 (Our Future On Earth) रिपोर्ट जारी की गई है।
  • यह रिपोर्ट 52 देशों के 222 प्रमुख वैज्ञानिकों के सर्वेक्षण पर आधारित है।
  • यह रिपोर्ट वर्ष 2050 तक ‘कार्बन फुटप्रिंट में कमी लाने और वैश्विक तापमान वृद्धि में पूर्व-औद्योगिक स्तर के 2 डिग्री सेल्सियस कम रखने के उद्देश्य से जारी की गई।
  • रिपोर्ट निम्नलिखित पाँच वैश्विक जोखिमों की पहचान करती है:
  • जलवायु परिवर्तन के प्रति शमन और अनुकूलन (Mitigation and Adaptation) की विफलता।
  • चरम मौसमी घटनाएँ।
  • जैव विविधता हानि और पारिस्थितिकी तंत्र का पतन।
  • खाद्यान संकट।
  • जल संकट।
  • रिपोर्ट में इन जोखिम कारकों के परस्पर अंतर्संबंधों के परिणामस्वरूप संभाव्य वैश्विक जलवायु संकट की बात कही गई है और इसके उदाहरण प्रस्तुत किये है। उदाहरणतः अत्यधिक ऊष्म तरंगें (Heat Wave) पारिस्थितिकी तंत्र में संग्रहित कार्बन की बड़ी मात्रा का निष्कासन करके न केवल ग्लोबल वार्मिंग की बढ़ाती है बल्कि जल व खाद्यान संकट भी उत्पन्न करती है।
  • इसी प्रकार जैव विविधता में हानि से कृषि प्रणालियों की चरम जलवायु घटनाओं से निपटने की क्षमता कमजोर होती तथा इससे खाद्य संकट की सुभेद्यता बढ़ जाती है।

फ्यूचर अर्थ (Future Earth):

  • यह एक अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान नेटवर्क है जिसका उद्देश्य वैश्विक जलवायु परिवर्तन में मानव की भूमिका की दिशा में समझ में वृद्धि तथा सतत् विकास की दिशा में अनुसंधान को आगे बढ़ाना है।
  • फ्यूचर अर्थ की शासन परिषद में बेलमोंट फोरम (Belmont Forum), संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU), अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद (ISC), विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और एसटीएस (STS) मंच शामिल है।

रिपोर्ट से संबंधित अन्य महत्त्वपूर्ण जानकारी

  1. ऊष्मा में कमी के प्रयास (Dialing Down the Heat):

  • सभी वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी हेतु किये जाने वाले प्रयासों का समय लगातार घटता जा रहा है, क्योंकि वर्तमान प्रयास इस दिशा में पर्याप्त नहीं है।
  • यथा हाल ही में 700 से अधिक शहरों, राज्यों और सरकारों के नेताओं को जलवायु संकट या जलवायु आपातकाल की घोषणा करने के लिये प्रेरित किया है।
  • फिर भी वर्ष 2019 के दौरान वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता 415 PPM (Parts Per Million) से अधिक पाई गई साथ ही वर्ष 1880 के बाद वर्ष 2014-2018 के बीच पाँच वर्षों की अवधि में स्थल और सागर दोनों ही सबसे अधिक गर्म रहे हैं।
  1. लोकलुभावन नीतियाँ बनाम ज़मीनी आंदोलन (Populism Versus Grassroots Movements):

  • जलवायु परिवर्तन के खिलाफ चलने वाले आंदोलन, दक्षिणपंथी लोकलुभावनवादी राजनीति, आर्थिक क्षेत्र में गिरावट और बढ़ती असमानता के चलते पर्यावरण संरक्षण के आकांक्षी लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाते।
  • लोकलुभावन राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों के चलते देश की सीमाओं को बाहरी लोगों के लिये बंद करने तथा आप्रवासियों (Immigrants) को अस्वीकार करने पर केंद्रित हैं।
  • ये आन्दोलन जलवायु परिवर्तन संबंधी तथ्यों तथा प्रभावों का खंडन करते हैं।
  1. प्राकृतिक क्षेत्रों के संरक्षण की आवश्यकता (Need for conservation of natural areas):

  • हमारे ग्रह के भूमि क्षेत्र का 75% हिस्सा मनुष्य ने अब ‘काफी बदल दिया है।
  • पौधे और पशु समूहों की लगभग एक-चौथाई प्रजातियाँ खतरे में हैं।
  • वर्ष 2018 में दुनिया के अंतिम मेल (Male) उत्तरी सफेद गैंडे (Northern White Rhino) की केन्या में मृत्यु हो गई, जबकि ब्राज़ीलियाई नीले तोते स्पिक्स मैकॉ (Spix’s Macaw) को जंगल से विलुप्त घोषित किया गया।
  • इस ग्रह पर जीवन की क्षति को रोकने के लिये संरक्षण के नवीन तरीकों की आवश्यकता होगी।
  1. वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर पुनर्विचार (Rethinking Global Food Security):

  • जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि, बढ़ती वैश्विक आबादी जैसे विभिन्न कारकों के कारण खाद्य उत्पादन पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
  1. दुष्प्रचार को रोकना (Industrializing Disinformation):

  • दुनिया में सूचना का प्रवाह प्रारूप बदल रहा है, क्योंकि आज ग्रह के 7.6 बिलियन लोगों में से लगभग आधे लोगों के पास ऑनलाइन सुविधा हैं, वे सोशल मीडिया, सर्च इंजन और ई-कॉमर्स एल्गोरिदम (Algorithms) आदि से गहराई से प्रभावित हैं।
  • ये ‘डिजिटल प्लेटफॉर्म, भावनाओं को तर्क (Reason) के साथ जोड़ने के अनुरूप तैयार की गई जानकारी को महत्त्व देते हैं जो ‘फ़ेक समाचार (Fake News) के प्रचार का कारण बन सकते हैं, चूँकि ‘फ़ेक समाचार छह गुना तेज़ी और 100 गुना से अधिक लोगों तक पहुँच सकती है।
  • यह विश्वास-क्षरण (Erosion of Trust) करके सामाजिक-हानि कर सकता हैं। अतः मिडिया यहाँ प्रमुख भूमिका निभा सकता है।
  1. पर्यावरणीय स्वास्थ्य और शिक्षा (Environmental Health and Education):

  • माध्यमिक शिक्षा के अंतिम चार वर्ष, बच्चों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने के लिये एक उचित आधार प्रदान कर सकते हैं।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्कूल स्तर पर पर्यावरणीय स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रश्न को संबोधित किया जाए, इसके बिना कोई भी सरकारी नियम और नीतियाँ मददगार नहीं हो सकती हैं।

प्रीलिम्स के लिए तथ्य

कोरकू जनजाति :

  • कोरकू जनजाति मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के मेलघाट टाइगर रिज़र्व (Melghat Tiger Reserve) के निकटवर्ती क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • ‘कोरकू’ नाम की उत्पत्ति दो शब्दों ‘कोरो’ जिसका अर्थ ‘व्यक्ति होता है और ‘कू’ जिसका अर्थ जीवित होता है, से मिलकर हुई है।
  • यह जनजाति कोरकू भाषा बोलती है जिसका संबंध मुंडा भाषायी समूह से है और इसकी लिपि देवनागरी है।
  • भारत सरकार द्वारा कोरकू जनजाति को अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • कोरकू जनजाति घास और लकड़ी से बनी झोपड़ियों में रहती है। प्रत्येक घर की संरचना में सामने वाला हिस्सा एलिवेटेड स्टेज की तरह होता है, इस एलिवेटेड स्टेज का उपयोग कृषि उपज के भंडारण हेतु किया जाता है।
  • वे स्थानीय रूप से तैयार की गई महुआ के फूलों से बनी शराब का सेवन करते हैं। इनकी अधिकांश आबादी कृषक है।
  • इस जनजाति के पारंपरिक त्योहार हरि एवं जिटोरी हैं जिनमें एक महीने तक पौधा रोपण अभियान चलाया जाता है। इस तरह ये लोग कुपोषण एवं पर्यावरण क्षरण का मुकाबला करते हैं।

मेलघाट टाइगर रिज़र्व के बारे में

  • यह टाइगर रिज़र्व महाराष्ट्र राज्य के अमरावती ज़िले में स्थित है, इसका क्षेत्रफल 1677 वर्ग किमी. है।
  • यह वर्ष 1974 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत घोषित किये गए पहले नौ टाइगर रिज़र्व में से एक है।
  • यह टाइगर रिज़र्व ताप्ती नदी और सतपुड़ा रेंज की गवलीगढ़ रिज़ से घिरा हुआ है।

 

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