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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

अरुणाचल प्रदेश: 6वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग

19th August, 2020

G.S. Paper-II (National)

 चर्चा में क्यों?

हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में दो स्वायत्त परिषदों द्वारा पूरे अरुणाचल प्रदेश को संविधान की 6 वीं अनुसूची या अनुच्छेद 371 ()  के दायरे में लाने की मांग की गई है।

प्रमुख बिंदु

  • वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश तो 5 वीं अनुसूची में शामिल है और  ही 6 वीं अनुसूची के अंतर्गत है। यह इनर लाइन परमिट ( Inner Line Permit- ILP) प्रणाली के अंतर्गत है।
  • 6वीं अनुसूची असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा में लागू है।
  • 5वीं अनुसूचीमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान के क्षेत्र शामिल हैं।
  • दूसरी ओर, नगालैंड में अनुच्छेद 371 लागू होता है जो नागालैंड को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करता है।
  • 6वीं अनुसूची:संविधान की 6 वीं अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिये इन राज्यों में जनजातीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करने का प्रावधान करती है।
  • यह विशेष प्रावधान संविधान केअनुच्छेद 244 (2) और अनुच्छेद 275 (1) के तहत प्रदान किया गया है।
  • उपर्युक्त राज्यों में जनजातियों द्वारा राज्यों के अन्य लोगों की जीवन शैली को बहुत अधिक आत्मसात नहीं किया गया है। इन क्षेत्रों में अभी भीनृवैज्ञानिक प्रतिरूपों (Anthropological Specimens) की उपस्थिति है।
  • संविधान सभा द्वारा गठितबोरदोलोई समिति (Bordoloi Committee) की रिपोर्टों के आधार पर, 6वीं अनुसूची को पूर्वोत्तर के आदिवासी क्षेत्रों को सीमित स्वायत्तता प्रदान करने के लिये तैयार किया गया था।
  • समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिये एकप्रशासनिक प्रणाली की आवश्यकता है।
  • इस रिपोर्ट मेंमैदानी इलाकों के लोगों के शोषण से इन आदिवासी क्षेत्रों की सुरक्षा के लिये तथा उनके विशिष्ट सामाजिक रीति-रिवाज़ों के संरक्षण का आह्वान किया गया।

 

6वीं अनुसूची में प्रशासन

  • 6वीं अनुसूची क्षेत्र में जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िलों के रूप में गठित किया गया है।स्वायत्त ज़िलों को राज्य विधान मंडल के भीतर स्वायत्तता का अलग दर्ज़ा प्रदान किया जाता है।
  • 10 स्वायत्त ज़िले हैं, जिनमें असम, मेघालय और मिज़ोरम प्रत्येक में तीन-तीन एवं एक त्रिपुरा में है।
  • प्रत्येक स्वायत्त ज़िले में एक अलग क्षेत्रीय परिषद भी हो सकती है।
  • आदिवासियों कोस्वायत्त क्षेत्रीय परिषद (Autonomous Regional Council) एवं स्वायत्त ज़िला परिषदों (Autonomous District Councils- ADCs) के माध्यम से विधायी और कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता दी गई है।
  • ADCs कोनागरिक और न्यायिक शक्तियाँ प्राप्त हैं। वे राज्यपाल से उचित अनुमोदन प्राप्त होने पर भूमि, वन, मत्स्य, सामाजिक सुरक्षा आदि जैसे विषयों पर भी कानून बना सकती हैं।
  • संसदएवं राज्य विधान सभाओं द्वारा पारित अधिनियमों को इन क्षेत्रों में तब तक लागू नहीं किया जा सकता है जब तक कि राष्ट्रपति और राज्यपाल स्वायत्त क्षेत्रों के लिये कानूनों में संशोधन के साथ या इसके बिना उसे अनुमोदित नहीं कर दे।

राज्यपाल का नियंत्रण

  • विभिन्न स्वायत्तता के बावजूद, 6 वीं अनुसूचीमें शामिल क्षेत्र राज्य के कार्यकारी प्राधिकरण के बाहर नहीं है।
  • राज्यपाल को स्वायत्त ज़िलों कानिर्माण करने एवं उन्हें पुनः व्यवस्थित करने का अधिकार प्राप्त है। वह स्वायत्त ज़िलों के क्षेत्रों को बढ़ा या घटा सकता है या उनके नाम परिवर्तित कर सकता है या उनकी सीमाओं को परिभाषित कर सकता है।
  • यदि एक स्वायत्त ज़िले में विभिन्न जनजातियाँ विद्यमान हैं, तो राज्यपाल ज़िले को कई स्वायत्त क्षेत्रों में भी विभाजित कर सकता है।

स्वायत्त परिषदों की संरचना

  • प्रत्येक स्वायत्त ज़िला एवं क्षेत्रीय परिषद में 30 से अधिक सदस्य नहीं होते हैं, जिनमें चार को राज्यपाल द्वारा एवं अन्य सदस्यों को चुनाव के माध्यम से नामित किया जाता है। ये सभी पाँच वर्ष के लिये सत्ता में बने रहते हैं।
  • हालाँकि, बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद एक अपवाद है क्योंकि यहाँ की क्षेत्रीय परिषद 46 सदस्यों से मिलकर बनी है।

अनुच्छेद 371

  • जब तक कि राज्य विधानसभा द्वारा निर्णय नहीं लिया जाता है तब तक निम्नलिखित मामलों से संबंधित संसद के अधिनियम नगालैंड पर लागू नहीं होंगे
  • नागाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथा।
  • नागा प्रथागत कानून और प्रक्रिया।
  • नाग प्रथा कानून के अनुसार निर्णय लेने वाले नागरिक और आपराधिक न्याय का प्रशासन।
  • ज़मीन एवं उसके संसाधनों का स्वामित्व और हस्तांतरण।

 

इजराइल और यूएई के बीच ऐतिहासिक शांति समझौता

 G.S. Paper-II (International)

  • अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सहायता से इजराइलऔर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच 13 अगस्त 2020 को ऐतिहासिक शांति समझौता किया गया. दोनों देशों के बीच कई सालों से चल रही दुश्मनी नए समझौते के साथ ही महत्वपूर्ण हो गई. नए समझौते के तहत अब दोनों देश एक दूसरे के साथ राजनयिक संबंधो की नई बुनियाद रखेंगे.

पहला खाड़ी देश

  • इस समझौते के तहत इजरायल ने फिलिस्तीन के वेस्ट बैंक इलाके में अपनी दावेदारी छोड़ने को तैयार हो गया है. वहीं, यूएई, इजरायल से पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल करने को राजी हो गया. ऐसा करने वाला वह पहला खाड़ी देश बन गया है.

राष्ट्रपति ट्रंप ने क्या कहा?

  • अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओवल ऑफिस से कहा कि 49 वर्षों के बाद, इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात अपने राजनयिक संबंधों को पूरी तरह से सामान्य करेंगे. व्हाइट हाउस द्वारा जारी संयुक्त बयान में तीनों देशों का कहना है कि यह ऐतिहासिक राजनयिक सफलता मध्य पूर्व क्षेत्र में शांति को आगे बढ़ाएगी.

आर्थिक विकास में तेजी

  • राष्ट्रपति ट्रंप, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अबू धाबी क्राउन प्रिंस ने संयुक्त बयान में कहा कि मध्य पूर्व के दो सबसे गतिशील समाजों और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के बीच सीधे संबंध खुलने से आर्थिक विकास में तेजी आएगी, तकनीकी नवाचार बढ़ेगा और लोगों से करीबी लोगों के बीच संबंध बढ़ेगा.

राष्ट्रपति ट्रंप का महत्वपूर्ण योगदान

  • इस समझौते को अंतिम मुकाम तक पहुंचाने में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अहम योगदान रहा है. समझौते के तहत इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात के प्रतिनिधिमंडल आने वाले हफ्तों में निवेश, पर्यटन, सीधी उड़ान, सुरक्षा, दूरसंचार और अन्य मुद्दों पर द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर करेंगे.

यूएई अरब राष्ट्रों में तीसरा देश होगा

  • यूएई अरब राष्ट्रों में इजरायल से राजनयिक संबंध शुरू करने वाला तीसरा देश होगा. अभी केवल मिस्र और जॉर्डन के इजरायल के साथ राजनयिक संबंध हैं. मिस्र ने साल 1979 में इजरायल के साथ एक शांति समझौता किया, उसके बाद साल 1994 में जॉर्डन के साथ हुआ था.

 

 एक राष्ट्र एक मतदाता पहचान पत्र

(One Nation One Voter ID)

G.S. Paper-II (National)

संदर्भ

  • देश में जारी COVID-19 महामारी के मद्देनजर, भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India- ECI) ने65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए डाकमतपत्र (Postal Ballot) द्वारा अपने मताधिकार का प्रयोग करने की अनुमति दी है; क्योंकि इस आयु-वर्ग के लोगों में कोरोनावायरस से संक्रमित होने का अधिक खतरा है।
  • अभी तक, यह विकल्प केवल विकलांग नागरिकों तथा 80 वर्ष अधिक आयु के लोगों के लिए उपलब्ध था।
  • इस लेख में इसी प्रावधान का विस्तारमताधिकार को प्रयोग करने में भारी कठिनाइयों का सामना करने वाले अन्य समूह; प्रवासी मजदूरों, तक करने का निवेदन किया गया है।

प्रवासी श्रमिकों के लिए क्यों?

  • 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, देश मेंआंतरिक प्रवासी श्रमिकों की संख्या लगभग9 करोड़ है, जोकि, भारत की कुल श्रम शक्ति का लगभग एक तिहाई है।
  • ये प्रवासी श्रमिक बहुधा अपनेमताधिकार का प्रयोग करने में असमर्थ होते हैं। इस प्रकार, ये प्रवासी-मजदूर अपने मताधिकार से लगभग वंचित, भूले-बिसरे मतदाता बन कर रह जाते है, क्योंकि ये लोग अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए निर्वाचन वाले दिन अपने घर जाने का जोखिम नहीं उठा सकते।
  1. आंतरिक प्रवासी श्रमिकअपने रोजगार के स्थान पर मतदाता के रूप में नामांकन नहीं करा पाते क्योंकि इनके लिए आवास का प्रमाण देना कठिन होता है।
  2. इस समूह पर पर्याप्त ध्यान भी नहीं दिया जाता है, क्योंकि ये किसीवोटबैंक का निर्माण नहीं करते है।
  3. इनमे से अधिकाँशमौसमी प्रवासी श्रमिक होते हैं, जो अवसर मिलने पर अपने गांवों में मतदान करना चाहते हैं।

आगे की राह

  • प्रत्येक योग्य भारतीय मतदाता को अपने मताधिकार का सुनिश्चित प्रयोग करने में सक्षम बनाना, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के प्रमुख उद्देश्यों में सम्मिलित होना चाहिए।
  • ECI, देश में कहीं से भी मतदाताओं द्वारा डिजिटल रूप से मतदान करने हेतु सक्षम बनाने के लिएआधारलिंक्ड वोटरआईडी आधारित समाधान का परीक्षण कर रहा है।
  1. प्रवासी श्रमिकों को मतदान की सुविधा प्रदान करने हेतु, ECI, पर्याप्त पंहुच के लिए, जिला कलेक्ट्रेट नेटवर्क का उपयोग कर सकता है।
  2. प्रवासियों को अपने मौजूदा मतदाता पहचान पत्र और उनके अस्थायी प्रवास की अवधि के आधार पर अपने रोजगार के शहर में भौतिक रूप से मतदान करने में सक्षम होना चाहिए।

निष्कर्ष

  • मतदान को केवल नागरिक कर्तव्य के रूप में नहीं बल्कि नागरिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए। हमारे नीति-निर्माताओं को ‘एक राष्ट्र एक मतदाता पहचान पत्र’ लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करना होगा, ताकि मतपत्रपरिवर्तनीयता को सुनिश्चित करते हुएभूलेबिसरेप्रवासी मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने में सक्षम हो सकें।

प्री के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

गैया परिकल्पना

Gaia Hypothesis

गैया परिकल्पना (Gaia Hypothesis) एक वैज्ञानिक परिकल्पना को संदर्भित करती है जो बताती है कि पृथ्वी एक जटिल जीवित इकाई (Complex Living Entity) है जिसमें जीवों एवं उनके भौतिक परिवेश के बीच स्व-विनियमन जुड़ाव के आधार पर एक संतुलन कायम है।

प्रमुख बिंदु

  • इस परिकल्पना को पहली बार ब्रिटिश वैज्ञानिकजेम्स लवलॉक (James Lovelock) ने वर्ष 1972 के अपने पत्र ’ Gaia As Seen Through The Atmosphere’ में प्रस्तुत किया था।
  • इस परिकल्पना का नाम पौराणिक ग्रीक देवीगैया’ (Gaia) के नाम पर रखा गया है जो पृथ्वी का प्रतिनिधित्त्व करती है।
  • इस परिकल्पना के प्रमुख उदाहरण के तौर पर जलवायु परिवर्तन जैसी स्थितियाँ मनुष्य एवं भौतिक वातावरण के बीच परस्पर क्रिया पर निर्भर करती हैं जिसमें सभी एक-दूसरे को लगातार नियंत्रित करते रहते हैं।
  • जेम्स लवलॉक कीगैया परिकल्पनाएक एकीकृत प्रणाली के रूप में पृथ्वी की प्रकृति के बारे में पारंपरिक सोच को चुनौती देती है। जेम्स लवलॉक ने बताया कि जैसे-जैसे पृथ्वी की भौतिक प्रणाली में परिवर्तन होते हैं वैसे-वैसे जीवित प्रणाली ऐसे परिवर्तनों को कम करने के लिये प्रतिक्रिया देती है।

 

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