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डेली करेंट अफेयर्स 2020

विषय: प्रीलिम्स और मेन्स के लिए

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)

27th October, 2020

G.S. Paper-II

संदर्भ:

भारत ने 35 वर्षों बाद अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organization– ILO) के शासी निकाय (Governing Body) की अध्यक्षता की है।

श्रम और रोजगार सचिव श्री अपूर्व चंद्रा को अक्टूबर 2020 से जून 2021 तक की अवधि के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन- ILO के शासी निकाय के अध्यक्ष के रूप में चुना गया है।

ILO का शासी निकाय-

  • शासी निकाय (Governing Body), अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(ILO) का शीर्ष कार्यकारी निकाय है जो नीतियों, कार्यक्रमों, एजेंडे, बजट का निर्धारण करता है और महानिदेशक का चुनाव का कार्य भी करता है।
  • इसकीजेनेवा, स्विट्ज़रलैंड में प्रतिवर्ष तीन बैठकें होती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बारे में:

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना प्रथम विश्व युद्ध के बादलीग ऑफ़ नेशनकी एक एजेंसी के रूप में की गयी थी।

  • इसे वर्ष 1919 में वर्साय की संधि द्वारा स्थापित किया गया था।
  • वर्ष 1946 में ILO, संयुक्त राष्ट्र (United Nations– UN) की पहली विशिष्ट एजेंसीबन गया।
  • वर्ष 1969 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन को नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।
  • यहसंयुक्त राष्ट्र की एकमात्र त्रिपक्षीय एजेंसी है जो सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिकों को एक साथ लाती है।
  • मुख्यालय:जिनेवा, स्विट्जरलैंड।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की प्रमुख रिपोर्ट्स-

  • विश्व रोज़गार और सामाजिक दृष्टिकोण (World Employment and Social Outlook)
  • वैश्विक मजदूरी रिपोर्ट (Global Wage Report)

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के प्रदर्शन का विश्लेषण

G.S. Paper-II

ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) क्या है?

ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) एक सहकर्मी-समीक्षित प्रकाशन (Peer-Reviewed Publication) है, जिसे प्रतिवर्ष वेल्ट हंगर हिल्फे (Welt Hunger Hilfe) तथा कंसर्न वर्ल्डवाइड (Concern Worldwide) द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया जाता है।

यह वैश्विकक्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर ‘भूख’ संबंधी आंकड़ो को तैयार करता है।

GHI रैंकिंग तैयार करने हेतु चार संकेतकों के आधार पर गणना की जाती है:

  • अल्पपोषण (UNDERNOURISHMENT):अल्प-पोषित आबादी का हिस्सा जो अपर्याप्त कैलोरी सेवन को दर्शाता है।
  • बालनिर्बलता(CHILD WASTING): पांच वर्ष से कम उम्र के वे बच्चे, जिनका वज़न उनकी लंबाई के अनुपात में कम होता है, तीव्र कुपोषण को दर्शाता है।
  • बच्चों में नाटापन (CHILD STUNTING):पांच वर्ष से कम उम्र के वे बच्चे आते हैं जिनकी लंबाई आयु के अनुपात में कम होती है। यह दीर्घकालिक कुपोषण को दर्शाता है।
  • बाल मृत्यु दर(CHILD MORTALITY): पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर। यह आंशिक रूप से, अपर्याप्त पोषण और अस्वास्थ्यकर वातावरण के घातक मिश्रण को प्रतिबिंबित करती है।

GHI मापक-

  • ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) मेंसे 100 अंको के मापक पर देशों की रैंकिंग की जाती है, जिसमे ‘0’ सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (भूखमुक्त) तथा ‘100’ सबसे ख़राब प्रदर्शन को दर्शाता है।
  • 10 अंक से कम स्कोर ‘भूख के निम्न स्तर’ को दर्शाता है; 20 से9 तक का स्कोर ‘भूख के गंभीर स्तर’ का संकेतक होता है; 35 से 49.9 तक का स्कोर ‘भूख के खतरनाक स्तर’ तथा 50 या उससे अधिक का स्कोर ‘भूख के अत्यंत चिंताजनक स्तर’ को बताता है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI)- 2020 रिपोर्ट: प्रमुख निष्कर्ष-

विश्व में लगभग 690 मिलियन लोग कुपोषण से ग्रसित हैं; 144 मिलियन बच्चे नाटेपन (Stunting) से पीड़ित हैं, यह दीर्घकालिक कुपोषण का संकेत है। 47 मिलियन बच्चे ‘दुर्बलता’ (Wasting) से ग्रसित हैं, यह भी तीव्र कुपोषण की ओर संकेत करता है।

GHI में भारत और पड़ोसी देशों की स्थिति:

  • भारत, 107 देशों के सूचकांक में94 वें स्थान पर है, तथा बांग्लादेश (75) और पाकिस्तान (88) जैसे अपने पड़ोसी देशों से पीछे है।
  • रिपोर्ट मेंभारत कोअंक प्राप्त हुए हैं और इसे गंभीर श्रेणी में रखा गया है। दो दशक पूर्व भारत का स्कोर 38.9 था और ‘खतरनाक श्रेणी’ में रखा गया था, उस समय की तुलना में भारत की स्थिति में सुधार हुआ है।
  • ब्रिक्स समूह के अन्य सदस्य देशों की तुलना में भारत का प्रदर्शन बहुत ही ख़राब है। चीन और ब्राजील नेशीर्ष पांच देशों में स्थान प्राप्त किया है। दक्षिण अफ्रीका 5 अंको के साथ 60 वें स्थान पर रहा है, जो भूख के मध्यम स्तर का संकेत देता है।
  • भारत 107 देशों में से 94 वें स्थान पर है और सूडान के साथ रैंक साझा करता है।
  • भारत में, पांच वर्ष से कम उम्र के उन बच्चों, जिनका वज़न उनकी लंबाई के अनुपात में कम होता है, की संख्या विश्व में सर्वाधिक है, जो तीव्र कुपोषण को दर्शाती है, औरयह स्थिति भारत को अफ्रीका के सबसे गरीब देशों के समकक्ष रखती है। कुछ संकेतक में पिछले पांच वर्षों में वास्तविक गिरावट दिखाते हैं।

विभिन्न मापदंडों में भारत का प्रदर्शन:

  • समग्र रूप से अल्पपोषण (Overall undernourishment): भारत की 14% आबादी को पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती है। हालांकि इसे वर्ष 2005-07 की तुलना में सुधार कहा जा सकता है, जब 20% आबादी को पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती थी।
  • बाल मृत्यु दर (Child Mortality Rate):वर्ष 2000 में2% से कम होकर 2020 में 3.7% हो गयी है।
  • बच्चों में नाटापन (Child Stunting): भारत में बच्चों में नाटापन दर4% है। हालांकि यह वर्ष 2000 के 54.2% की दर से बहुत बेहतर है, और यह अभी भी विश्व में सबसे खराब स्थिति में है।
  • बालनिर्बलता (Child Wasting):देश में बाल-निर्बलता (Child Wasting) दर3% है, तथा यह विश्व में सर्वाधिक है।

भारत में बच्चों में नाटापन तथा बाल-निर्बलता के उच्च स्तर के प्रमुख कारण-

  1. मातृ स्वास्थ्य की ख़राब स्थिति (Poor maternal health):दक्षिण एशियाई बच्चों के जीवन के पहले छह महीनों के भीतर ही ‘दुर्बलता’ संबधी लक्षणों का उच्च स्तर दिखने लगता है। यह मातृ स्वास्थ्य की खराब स्थिति को दर्शाता है।
  2. माताओं की गर्भधारण करते समय आयु बहुत कम होती हैतथा वे छोटी और दुर्बल होती हैं, इसके अलावा माताएं स्वयं कुपोषण का शिकार होती हैं।
  3. स्वच्छता का निम्न स्तरभी बच्चे की दुर्बलता और उसके नाटेपन का एक अन्य प्रमुख कारण है।

विभिन्न भारतीय राज्यों के मध्य तुलना-

  1. झारखंड में लगभगप्रत्येक तीन में से एक बच्चा तीव्र कुपोषण का शिकार है, तथा यहाँ बाल-निर्बलता (Child Wasting) की दर 29% है।
  2. तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे अन्य बड़े राज्यों में भीप्रत्येक पांच में से एक बच्चादुर्बलताका शिकार है।
  3. आमतौर पर विकास सूचकांकों पर खराब प्रदर्शन करने वाले बिहार, राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्यों में बाल-निर्बलता दर 13-14% है, जो कि राष्ट्रीय औसत से बेहतर है।
  4. उत्तराखंड और पंजाबसहित कई उत्तरपूर्वी राज्यों में, बाल-निर्बलता का स्तर 10% से कम है।
  5. बच्चों के नाटापन (Child Stunting)के संदर्भ में बिहार का प्रदर्शन सबसे खराब है, यहाँ 42% बच्चों का कद उनकी आयु की तुलना में बहुत कम हैं। गुजरात सहित बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी बच्चों के नाटापन की दर 40% से कम है।
  6. मापक के दूसरे छोर पर, जम्मू और कश्मीर में केवल15% बच्चे नाटेपन के शिकार हैं, तथा तमिलनाडु और केरल में इनकी संख्या 20% के आसपास हैं।

फ्लैश फ्लड

G.S. Paper-III (Environment / Disaster Management)

संदर्भ-

हाल ही में भारतीय मौसम विभाग ने दक्षिण एशिया के लिए अचानक आनेवाली बाढ़ से जुड़ी मार्गदर्शन सेवाएं प्रारम्भ की है.

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम. राजीवन ने 22 अक्टूबर 2020 को भारत, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए अचानक आनेवाली बाढ़ से जुड़ी अपनी तरह की पहली मार्गदर्शन सेवाओं की शुरुआत की.

पृष्ठभूमि-

  • अचानक आनेवाली बाढ़ से प्रभावित आबादी के जीवन और संपत्तियों पर विशेष रूप से विनाशकारी प्रभाव को देखते हुए, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की पंद्रहवीं कांग्रेस ने वैश्विक कवरेज के साथ एकफ्लैश फ्लड गाइडेंस सिस्टम (एफएफजीएस) परियोजना के कार्यान्वयन को स्वीकृति दी थी.
  • जिसे डब्ल्यूएमओ कमीशन फॉर हाइड्रोलॉजी द्वारा डब्ल्यूएमओ कमीशन फॉर बेसिक सिस्टम के साथ संयुक्त रूप से और यूएस नेशनल वेदर सर्विस एवं यूएस हाइड्रोलॉजिकल रिसर्च सेंटर (एचआरसी) के सहयोग से विकसित विकसित किया गया था.
  • भारतीय मौसम विज्ञान विभाग कंप्यूटिंग पावर, न्यूमेरिकल वेदर प्रेडिक्शन, अवलोकन संबंधी विशाल नेटवर्क (जमीन, वायु और अंतरिक्ष पर आधारित) और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित मौसम पूर्वानुमान प्रणाली के संदर्भ में अत्यधिक उन्नत क्षमताओं से लैस है. इसलिए, विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने बेहतर समन्वय, विकास और कार्यान्वयन के लिए दक्षिण एशिया फ्लैश फ्लड गाइडेंस सिस्टम के क्षेत्रीय केंद्र की जिम्मेदारी भारत को सौंपी है.

क्या होती है फ्लैश फ्लड या आकस्मिक बाढ़ (FLASH FLOOD)?

  • फ्लैश फ्लड या अचानक आने वाली बाढ़ से आशय ऐसी बाढ़ की उन घटनाओं से है जहाँ वर्षा के कुछ ही घंटों के दौरान (या बाद में) जल स्तर काफी बढ़ जाता है.
  • फ्लैश फ्लड, बहुत अधिक उफान के साथ छोटी अवधि वाली अत्यधिक स्थानीयकृत घटनाएँ होती हैं. आमतौर पर वर्षा की शुरुआत और चरम उफान वाली बाढ़ की घटना के बीच की अवधि छह घंटे से कम होती है,
  • विश्व के अधिकांश देशों में फ्लैश फ्लड से जुड़ी चेतावनी जारी करने संबंधी क्षमता का अभाव है.
  • फ्लैश फ्लड और इसकी विभीषिका को देखते हुएविश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की पंद्रहवीं कांग्रेस द्वारा वैश्विक कवरेज के साथ एक ‘फ्लैश फ्लड गाइडेंस सिस्टम’ (FFGS) परियोजना के कार्यान्वयन को मंज़ूरी दी गई थी.
  • इस परियोजना को WMO के जल विज्ञान आयोग, अमेरिकी राष्ट्रीय मौसम सेवा, अमेरिकी जल अनुसंधान केंद्र, संयुक्त राज्य अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी(USAID) आदि के सहयोग से तैयार किया गया है.

फ्लैश फ्लड (Flash Flood) से जुड़ी मार्गदर्शन सेवाओं के विषय में-

  • अचानक आने वाली बाढ़ संबंधी मार्गदर्शन (फ्लैश फ्लड गाइडेंस) एक मजबूत प्रणाली है, जो अचानक आने वाली बाढ़ भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए डिज़ाइन की गई है.
  • यह रियल टाइम में 4 किमी x 4 किमी के दायरे में जलस्तर से संबंधित डाटा को उपलब्ध कराकर, 6-12 घंटे पहले ही अचानक आने वाली बाढ़ की चेतावनी प्रणाली के साथ आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए डिज़ाइन की गई है.
  • भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने प्री-ऑपरेशनल मोड में हाल के मानसून के मौसम के दौरान इस प्रणाली का परीक्षण किया है और इसके सत्यापन के लिए इस क्षेत्र के राष्ट्रीय जल विज्ञान और मौसम विज्ञान सेवाओं को अचानक आनेवाली बाढ़ से संबंधित बुलेटिन जारी किए गए थे.
  • स्थानीय स्तर पर अचानक आनेवाली बाढ़ की संभावित घटनाओं के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए इस प्रणाली में विज्ञान, गतिशीलता और निदान से जुड़ी गहरी जानकारियाँ विद्यमान हैं.

प्री के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

हिमालयन भूरा भालू

  • इसे हिमालयी लाल भालू(Himalayan red bear), इसाबेलिन भालू (Isabelline bear) या दज़ुतेह (Dzu-Teh) के नाम से भी जाना जाता है।
  • यहहिमालयी उच्च क्षेत्रों में पाया जाने वाला सबसे बड़ा मांसाहारी प्राणी है।
  • यहहिमाचल प्रदेशउत्तरांचल और जम्मू और कश्मीर सहित 23 संरक्षित क्षेत्रों में पाया जाता है।

IUCN स्थिति:

  • एक प्रजाति के रूप में भूरे भालू को IUCN द्वारासंकटमुक्त (Least Concern) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। किंतु यह उप-प्रजाति अत्यधिक संकटग्रस्त है और इसकी आबादी तेजी से घट रही है।
  • यह प्रजातिहिमालय क्षेत्रों में संकटग्रस्त (Endangered) है और हिंदूकुश क्षेत्र में घोरसंकटग्रस्त (Critically Endangered) है।

चर्चा का कारण-

  • हिमालयन भूरे भालू पर हाल ही में किए गए एक अध्ययन मेंजलवायु परिवर्तन के कारण इस प्रजाति के उपयुक्त निवास स्थान और जैविक गलियारों में महत्वपूर्ण कमी की भविष्यवाणी की गई है।
  • जिससे वैज्ञानिकों द्वारा इस प्रजाति के संरक्षण के लिए पश्चिमी हिमालय में संरक्षित-क्षेत्र नेटवर्क के अनुकूल स्थानिक योजना का सुझाव दिया गया है।

 

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